अध्याय १९० — वामदेव-वाम्य-वृत्तान्तः
The Vāmadeva Horses Episode and the Ethics of Promise
अहं नारायणो नाम शड्खचक्रगदाधर: । यावद्युगानां विप्रर्षे सहस्रपरिवर्तनात्,अशिशु: शिशुरूपेण यावदब्रह्मा न बुध्यते । ब्रह्मर्ष! मैं शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाला विश्वात्मा नारायण हूँ, सहस्र युगके अन्तमें जो प्रलय होता है वह जबतक रहता है, तबतक सब प्राणियोंको (महानिद्रारूप मायासे) मोहित करके मैं (जलमें) शयन करता हूँ। मुनिश्रेष्ठ! यद्यपि मैं बालक नहीं हूँ, तो भी जबतक ब्रह्मा नहीं जागते, तबतक सदा इसी प्रकार बालकरूप धारण करके यहाँ रहता हूँ
ahaṁ nārāyaṇo nāma śaṅkhacakragadādharaḥ | yāvad yugānāṁ viprarṣe sahasraparivartanāt, aśiśuḥ śiśurūpeṇa yāvad abrahmā na budhyate |
神祇说道:“我名那罗延(Nārāyaṇa),执螺、持轮、握杵。婆罗门圣见者啊,当千劫既满而至的大毁灭持续之时,我以大睡之幻使一切众生迷昧,卧息于水上。至上仙人啊,我虽非真为婴孩,然在梵天未醒之前,我恒如是住此,示现童子之形。”
देव उवाच