कामीकवन-समागमः
Kāmyaka Forest Meeting: Kṛṣṇa’s Visit; Mārkaṇḍeya and Nārada Arrive
“फिर उस धुृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनकों जीतना उनके लिये कौन बड़ी बात है, जो कपटटद्यूतका सेवन करनेवाला, लोकद्रोही, दम्भी तथा मोहमें डूबा हुआ है ।। मातरं चैव शोचामि कृपणां पुत्रगृद्धिनीम् यास्माकं नित्यमाशास्ते महत्त्वमधिकं परै:,“मैं पुत्रोंके प्रति स्नेह रखनेवाली अपनी उस दीन माताके लिये शोक करता हूँ, जो सदा यह आशा रखती है कि हम सभी भाइयोंका महत्त्व शत्रुओंसे बढ़-चढ़कर हो
mātaraṃ caiva śocāmi kṛpaṇāṃ putragṛddhinīm | yāsmākaṃ nityam āśāste mahattvam adhikaṃ paraiḥ ||
至于战胜持国之子难敌,又算得了什么大事?他沉迷诡诈的赌戏,祸害世人,骄矜自负,沉溺迷妄。我又为我那可怜的母亲而哀伤:她的心紧系诸子,常怀希冀,盼我等兄弟在威名与大业上胜过仇敌。
वैशम्पायन उवाच