Kubera’s Fivefold Nīti and Protection of the Pāṇḍavas (वैश्रवणोपदेशः)
शाल्मली: किंशुकाशोकाञछिंशपा: सरलांस्तथा । उनके साथ द्रौपदी तथा पूर्वोक्त महामना ब्राह्मण भी थे। वे सब लोग विहंगोंके मुखसे निकले हुए अत्यन्त मधुर सुन्दर, श्रवण-सुखद मादक एवं मोदजनक शुभ शब्द सुनते हुए तथा सभी ऋतुओंके पुष्पों और फलोंसे सुशोभित एवं उनके भारसे झुके वृक्षोंको देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। आम, आमड़ा, भव्य नारियल, तेंदू, मुंजातक, अंजीर, अनार, नीबू, कटहल, लकुच (बड़हर), मोच (केला), खजूर, अम्लवेंत, पारावत, क्षौद्र, सुन्दर कदम्ब, बेल, कैथ, जामुन, गम्भारी, बेर, पाकड़, गूलर, बरगद, पीपल, पिंड खजूर, भिलावा, आँवला, हरे, बहेड़ा, इंगुद, करौंदा तथा बड़े-बड़े फलवाले तिंदुक--ये और दूसरे भी नाना प्रकारके वृक्ष गन्धमादनके शिखरोंपर लहलहा रहे थे, जो अमृतके समान स्वादिष्ट फलोंसे लदे हुए थे। (इन सबको देखते हुए पाण्डवलोग आगे बढ़ने लगे।) इसी प्रकार चम्पा, अशोक, केतकी, बकुल (मौलशिरी), पुन्नाग (सुल्ताना चंपा), सप्तपर्ण (छितवन), कनेर, केवड़ा, पाटल (पाड़रि या गुलाब), कुटज, सुन्दर मन्दार, इन्दीवर (नीलकमल), पारिजात, कोविदार, देवदारु, शाल, ताल, तमाल, पिप्पल, हिंगुक (हींगका वृक्ष), सेमल, पलाश, अशोक, शीशम तथा सरल आदि वृक्षोंको देखते हुए पाण्डवलोग अग्रसर हो रहे थे ।। ४२ --५२३ || चकोरै: शतपन्रैश्व भुड़राजैस्तथा शुकै:,इन वृक्षोंपर निवास करनेवाले चकोर, मोर, भूृंगराज, तोते, कोयल, कलविंक (गौरैया- चिड़िया), हारीत (हारिल), चकवा, प्रियक, चातक तथा दूसरे नाना प्रकारके पक्षी, श्रवणसुखद मधुर शब्द बोल रहे थे। वहाँ चारों ओर जलचर जन्तुओंसे भरे हुए मनोहर सरोवर दृष्टिगोचर होते थे। जिनमें कुमुद, पुण्डरीक, कोकनद, उत्पल, कह्लार और कमल सब ओर व्याप्त थे। कादम्ब, चक्रवाक, कुरर, जलकुक्कुट, कारण्डव, प्लव, हंस, बक, मदगु तथा अन्य कितने ही जलचर पक्षी कमलोंके मकरन्दका पान करके मदसे मतवाले और हर्षसे मुग्ध हुए उन सरोवरोंमें सब ओर फैले थे
vaiśampāyana uvāca |
śālmalīḥ kiṁśukāśokāñ chiṁśapāḥ saralāṁs tathā |
毗湿摩波耶那说道:他们继续前行,望见娑罗摩梨(śālmalī)、金舒迦(kiṁśuka)、阿输迦(aśoka)、钦沙波(chiṁśapā)以及高耸的娑罗罗(sarala)松。德劳帕蒂与先前所说那位心怀宏远的婆罗门亦随行其侧。众人一边聆听群鸟口中流出的极其甘美、悦耳、似能醉心而生欢喜的吉祥鸣声,一边观看四时花果装点的林木;许多树枝因花果之重而低垂。甘陀摩达那的峰峦之上,诸多果树繁茂摇曳,累累结实,滋味如甘露;又有各色芳香的花树竞相吐艳。此景映出合乎法(dharma)的节制与坚忍:在流放与艰辛之中,般度五子仍为自然的秩序与慷慨所扶持;他们的旅程并非征服之路,而是以专注与自律穿行于一处神圣、滋养生命的境域。
वैशम्पायन उवाच
Even in adversity (the Pāṇḍavas’ exile), dhārmic life is sustained by attentiveness, restraint, and reverence for the ordered abundance of nature; the passage highlights how a disciplined journey can remain auspicious without violence or possession.
Vaiśampāyana describes the travelers moving forward with Draupadī and a brāhmaṇa, passing through Gandhamādana’s richly flowering and fruit-laden forests, hearing sweet bird-calls and observing many species of trees.