Sukanyā’s Encounter with the Aśvins and Cyavana’s Rejuvenation (लोमश–सुकन्या–च्यवनोपाख्यानम्)
भ्राजसे5स्मिन् वने भीरु विद्युत्सौदामनी यथा | न देवेष्वपि तुल्यां हि त्वया पश्याव भाविनि,“मेरा नाम इस जगतमें सुकन्या प्रसिद्ध है। मैं सम्पूर्ण हृदयसे सदा अपने पतिदेवके प्रति निष्ठा रखती हूँ।” यह सुनकर अश्विनीकुमारोंने पुनः हँसते हुए कहा--“कल्याणि! तुम्हारे पिताने इस अत्यन्त बूढ़े पुरुषके साथ तुम्हारा विवाह कैसे कर दिया? भीरु! इस वनमें तुम विद्युतकी भाँति प्रकाशित हो रही हो। भामिनि! देवताओंके यहाँ भी तुम-जैसी सुन्दरीको हम नहीं देख पाते हैं
bhrājase 'smin vane bhīru vidyut-saudāmanī yathā | na deveṣv api tulyāṃ hi tvayā paśyāva bhāmini ||
“怯怯的女子啊,在这林中你如闪电般辉耀;美丽的佳人啊,即便在诸天之中,我们也不见有谁能与你比肩。”
लोगश उवाच