Cyavana’s Tapas, Sukanyā’s Curiosity, and Śaryāti’s Appeasement (च्यवन-सुकन्या-उपाख्यान आरम्भ)
अज्ञानाद् बालया यत् ते कृतं तत् क्षन्तुमरहसि । ततोअब्रवीन्महीपालं च्यवनो भार्गवस्तदा,“भगवन्! मेरी बालिकाने अज्ञानवश जो आपका अपराध किया है, उसे आप कृपापूर्वक क्षमा करें।” उनके ऐसा कहनेपर भृगुनन्दन च्यवनने राजासे कहा--“राजन्! तुम्हारी इस पुत्रीने अहंकारवश अपमानपूर्वक मेरी आँखें फोड़ी हैं, अत: रूप और उदारता आदि गुणोंसे युक्त तथा लोभ और मोहके वशीभूत हुई तुम्हारी इस कन्याको पत्नीरूपमें प्राप्त करके ही मैं इसका अपराध क्षमा कर सकता हूँ। भूपाल! यह मैं तुमसे सच्ची बात कहता हूँ
ajñānād bālayā yat te kṛtaṃ tat kṣantum arhasi | tato 'bravīn mahīpālaṃ cyavano bhārgavas tadā |
罗摩沙说道:“请宽恕你年幼女儿因无知所为。”于是婆罗伽婆圣者遮婆那对王言道:“大王,你的女儿为傲慢所驱,侮辱我并伤害了我的双眼。因此,唯有我得以娶她为妻,方能赦免此罪——她虽具美貌与高贵德性,却也可能为欲望与迷妄所牵引。国主啊,我所言皆为实情。”
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