Prabhāsa-tīrthe Vṛṣṇi–Pāṇḍava-saṅgamaḥ; Halī Rāmasya dharma-vimarśaḥ
Meeting at Prabhāsa and Balarāma’s Reflection on Dharma
दुर्योधनश्नापि महीं प्रशास्ति न चास्य भूमिर्विवरं ददाति । धर्मादधर्मश्षरितो वरीया- नितीव मन्येत नरोडल्पबुद्धि:,उधर, दुर्योधन (अधर्मपरायण होनेपर भी) पृथ्वीका शासन कर रहा है। उसके लिये यह पृथ्वी भी नहीं फटती है। इससे तो मन्द बुद्धिवाले मनुष्य यही समझेंगे कि धर्माचरणकी अपेक्षा अधर्मका आचरण ही श्रेष्ठ है। दुर्योधन निरन्तर उन्नति कर रहा है और युधिष्छिर छलसे राज्य छिन जानेके कारण दुःख उठा रहे हैं। (युधिष्ठिर और दुर्योधनके दृष्टान्तको सामने रखकर) मनुष्योंमें परस्पर महान् संदेह खड़ा हो गया है। प्रजा यह सोचने लगी है कि हमें क्या करना चाहिये--हमें धर्मका आश्रय लेना चाहिये या अधर्मका?
duryodhanaś cāpi mahīṁ praśāsti na cāsya bhūmir vivaraṁ dadāti | dharmād adharmaḥ śarito varīyān itiiva manyeta naro ’lpabuddhiḥ ||
婆罗罗摩说道:“杜尤陀那虽行阿达摩,却仍统治大地,而大地也不为他裂开。见此情状,浅智之人或将以为不义胜于正法。因为杜尤陀那不断兴盛,而由提施提罗却因国土被欺夺而受苦。以此为鉴,众人心生重大疑惑——究竟当依归达摩,还是随从阿达摩?”
बलदेव उवाच