देव–विष्णु–संवादः । कालेयगणस्य समुद्राश्रयः । अगस्त्योपसर्पणम्
Devas and Viṣṇu on the Kāleyas; Approach to Agastya
तैस्त्रास्यमानास्त्रिदशै: समेतैः समुद्रमेवाविविशुर्भयार्ता: । प्रविश्य चैवोदधिमप्रमेयं झषाकुलं नक्रसमाकुलं च,संगठित देवताओंद्वारा त्रास दिये जानेपर वे सब दैत्य भयसे आतुर हो समुद्रमें ही प्रवेश कर गये। मत्स्यों और मगरोंसे भरे हुए उस अपार महासागरमें प्रविष्ट हो वे सम्पूर्ण दानव तीनों लोकोंका नाश करनेके लिये बड़े गर्वसे एक साथ मन्त्रणा करने लगे। उनमेंसे कुछ दैत्य जो अपनी बुद्धिके निश्चयको स्पष्टरूपसे जाननेवाले थे; (जगत्के विनाशके लिये) उपयोगी विभिन्न उपायोंका वर्णन करने लगे
tais trāsyamānās tridaśaiḥ sametaiḥ samudram evāviviśur bhayārtāḥ | praviśya caivodadhim aprameyaṃ jhaṣākulaṃ nakrasamākulaṃ ca ||
被集结的诸神逼迫驱赶,提底耶众惶惧奔逃,竟遁入大海。潜入那无量汪洋,鱼群繁盛,鳄类丛集,他们聚作一处,以傲慢之志共议毁灭三界之策;其中有些自恃判断明晰者,更陈列种种计谋,自以为足以摧坏宇宙。
लोगश उवाच