उद्योगपर्व — अध्याय ७७: पुरुषकार–दैवसंयोगः तथा दुष्टमन्त्रपरामर्शस्य राजनैतिक-परिणामः
Human Effort, Contingency, and the Political Effects of Corrupt Counsel
वध्यतां मम वार्ष्णेय निर्गतो$सौ सुयोधन: । वृष्णिकुलनन्दन! हमलोग अधर्मपूर्वक जूएमें पराजित किये गये और वनमें भेज दिये गये। यह सब देखकर मैंने मन-ही-मन पूर्णरूपसे निश्चय कर लिया था कि दुर्योधन मेरे द्वारा वधके योग्य है ।। १४ इ ।। न चैतदद्धुतं कृष्ण मित्रार्थ यच्चिकीर्षसि । क्रिया कथ॑ं च मुख्या स्यान्मृदुना चेतरेण वा,श्रीकृष्ण! आप मित्रोंके हितके लिये जो कुछ करना चाहते हैं, वह आपके लिये अद्भुत नहीं है। मृदु अथवा कठोर, जिस उपायसे भी सम्भव हो किसी तरह अपना मुख्य कार्य सफल होना चाहिये
arjuna uvāca |
vadhyatāṁ mama vārṣṇeya nirgato ’sau suyodhanaḥ |
na caitad adbhutaṁ kṛṣṇa mitrārthaṁ yac cikīrṣasi |
kriyā kathaṁ ca mukhyā syān mṛdunā cetareṇa vā ||
阿周那说道:“噢,瓦尔什涅耶啊,让我亲手诛杀苏优陀那——他如今已现身。又,噢,奎师那,你为友人之福祉而行事,并不稀奇。无论以柔和之道,还是以严厉之策,首要大业总须设法成就。”
अर्जुन उवाच