सैन्धवं दुःसहं चैव भूरिश्रवसमेव च । भगदत्तं च राजानं जलसन्ध॑ च पार्थिवम्,“संजय! तुम शान्तनुनन्दन पितामह भीष्म, राजा धुृतराष्ट्र, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य, कर्ण, महाराज बाह्नलीक, अश्वत्थामा, सोमदत्त, सुबलपुत्र शकुनि, दुःशासन, शल, पुरुमित्र, विविंशति, विकर्ण, चित्रसेन, राजा जयत्सेन, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्न्द, कौरवयोद्धा दुर्मुख, सिंधुराज जयद्रथ, दुःसह, भूरिश्रवा, राजा भगदत्त, भूपाल जलसन्ध तथा अन्य जो-जो नरेश कौरवोंका प्रिय करनेके लिये युद्धके उद्देश्यसे वहाँ एकत्र हुए हैं, जिनकी मृत्यु बहुत ही निकट है, जिन्हें दुर्योधनने पाण्डवरूपी प्रज्वलित अग्निमें होमनेके लिये बुलाया है, उन सबसे मिलकर मेरी ओरसे यथायोग्य प्रणाम आदि कहकर उनका कुशल-मंगल पूछना। संजय! तत्पश्चात् उन राजाओंके समुदायमें ही पापात्माओंमें प्रधान, असहिष्णु, दुर्बुद्धि, पापाचारी और अत्यन्त लोभी राजकुमार दुर्योधन और उसके मन्त्रियोंकोी मेरी कही हुई ये सारी बातें सुनाना'
saindhavaṁ duḥsahaṁ caiva bhūriśravasam eva ca | bhagadattaṁ ca rājānaṁ jalasandhaṁ ca pārthivam ||
三阇耶说:“(其中还有)信度之王阇耶德罗陀、杜赫萨诃、部利湿罗婆娑、婆伽达多王,以及阇罗散陀这位君主。”
संजय उवाच
The verse functions as a moral warning embedded in narrative: the momentum of war gathers many powerful figures into a single enterprise, highlighting how political loyalty and ambition can eclipse discernment (dharma-viveka) and draw entire lineages toward ruin.
Sañjaya is listing notable kings and warriors aligned with the Kauravas who have assembled for the coming conflict. This cataloging emphasizes the scale of the coalition and foreshadows the grave consequences of the war.