अर्जुन-माहात्म्य-चिन्ता
Dhṛtarāṣṭra’s Appraisal of Arjuna’s Strategic Supremacy
द्रोणकर्णो प्रतीयातां यदि वीरौ नरर्षभौ । कृतास्त्रौ बलिनां श्रेष्ठी समरेष्वपराजितौ,यदि बलवानोंमें श्रेष्ठ, अस्त्रविद्याके पारंगत विद्वान् तथा युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले, मनुष्योंमें अग्रगण्य वीरवर द्रोणाचार्य और कर्ण अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़ें तो भी मुझे अर्जुनपर विजय प्राप्त होनेमें महान् संदेह रहेगा। मैं तो देखता हूँ मेरी विजय होगी ही नहीं; क्योंकि कर्ण दयालु और प्रमादी है और आचार्य द्रोण वृद्ध होनेके साथ ही अर्जुनके गुरु हैं
droṇakarṇau pratīyātāṃ yadi vīrau nararṣabhau | kṛtāstrau balināṃ śreṣṭhau samareṣv aparājitau ||
持国王说道:“纵然人中如雄牛般的两位英雄——德罗纳与迦尔纳——上前迎战(阿周那),二人皆精通兵器之道,为强者之冠,且历战未尝败北,我仍深深怀疑能否战胜阿周那。因为我看不见我方必胜之兆:迦尔纳虽有恻隐之心,却易于疏忽;而师长德罗纳不仅年迈,且又是阿周那的亲师。”
धृतराष्ट उवाच