Sanatsujāta on the Imperceptible Eternal Light (यत्तच्छुक्रं महज्ज्योतिः)
असाधना वापि ससाधना वा समानमेतद् दृश्यते मानुषेषु । समानमेतदमृतस्येतरस्य मुक्तास्तत्र मध्व उत्सं समापु: । योगिनस्तं प्रपश्यन्ति भगवन्तं सनातनम्,कोई साधनसम्पन्न हों या साधनहीन, वह ब्रह्म सब मनुष्योंमें समानरूपसे देखा जाता है। वह (अपनी ओरसे) बद्ध और मुक्त दोनोंके ही लिये समान है। अन्तर इतना ही है कि इन दोनोंमेंसे जो मुक्त पुरुष हैं, वे ही आनन्दके मूलस्रोत परमात्माको प्राप्त होते हैं (दूसरे नहीं) उसी सनातन भगवान्का योगीलोग साक्षात्कार करते हैं
asādhanā vāpi sasādhanā vā samānam etad dṛśyate mānuṣeṣu | samānam etad amṛtasya itarasya muktās tatra madhv-utsaṃ samāpuḥ | yoginas taṃ prapaśyanti bhagavantaṃ sanātanam ||
无论有人缺乏修持,或具足修持,那至上实相在一切人中皆被见为同一。就其自身而言,它对系缚者与解脱者同等遍在;差别唯在于:唯有解脱者得达安乐之源——不死之主。正是这永恒的薄伽梵,为瑜伽行者所亲见。
सनत्सुजात उवाच