उद्योगपर्व — अध्याय 33: धृतराष्ट्र-विदुर संवादः (विदुरनीतिः)
आत्मानमेव प्रथम द्वेष्यरूपेण यो जयेत् । ततोअमात्यानमित्रांश्व न मोघं विजिगीषते,जो पहले इन्द्रियोंसहित मनको ही शत्रु समझकर जीत लेता है, उसके बाद यदि वह मन्त्रियों तथा शत्रुओंको जीतनेकी इच्छा करे तो उसे सफलता मिलती है
ātmānam eva prathamaṃ dveṣyarūpeṇa yo jayet | tato 'mātyān amitrāṃś ca na moghaṃ vijigīṣate ||
毗度罗说:凡先克其身——以心与诸根为首敌而加以征服——然后若欲制伏误导之臣与敌对之寇,其志不为空;必得成功。
विदुर उवाच