उद्योगपर्व — अध्याय २५: संजयदूतवाक्यम्
Sañjaya’s Envoy-Speech on Peace
कामार्थलाभेन तथैव भूयो न तृप्यते सर्पिषेवाग्निरिद्ध: । विषयोंका चिन्तन अपने शरीरको पीड़ा देता है। जो विषय-चिन्तनसे सर्वथा मुक्त है, वह कभी दुःखका अनुभव नहीं करता। जैसे प्रज्वलित अग्निमें ईंधन डालनेसे उसका बल बहुत अधिक बढ़ जाता है, उसी प्रकार विषयभोग और धनका लाभ होनेसे मनुष्यकी तृष्णा और अधिक बढ़ जाती है। घीसे शान्त न होनेवाली प्रज्वलित अग्निकी भाँति मानव कभी विषयभोग और धनसे तृप्त नहीं होता है
kāmārthalābhena tathaiva bhūyo na tṛpyate sarpiṣevāgniriddhaḥ |
三阇耶说道:“纵然得到了欲求之物与财富,人仍不知满足;贪渴反而更盛——正如烈火熊熊,添以酥油(ghee)不但不熄,反更炽烈。故而,纵情享受与不断攫取并不能止息渴望,只会使之愈加炽热,令心灵终不得圆满。”
संजय उवाच