Udyoga Parva 21 — Bhīṣma’s Conciliatory Counsel, Karṇa’s Rebuttal, and Dhṛtarāṣṭra Sends Sañjaya (भीष्म-कर्ण-विवादः; संजय-प्रेषणम्)
नीपस्न्नगा हज न्ि््श्िन्य्य - बारह वर्षका वनवास एवं एक वर्षका अज्ञातवास दोनों मिलाकर तेरह वर्ष समझने चाहिये। > यहाँ अनेक रूपधारी शब्दका यह तात्पर्य है कि अर्जुन इतने वेगसे युद्ध करते थे कि वे रणभूमिमें अनेक-से दिखायी देते थे। द्रोणपर्वके ८९ वें अध्यायमें युद्धके प्रसंगमें ऐसा वर्णन भी मिलता है-- अयं पार्थ: कुतः पार्थ एष पार्थ इति प्रभो । तव सैन्येषु योधानां पार्थभूतमिवाभवत् ।। अन्योन्यमपि चाजघ्नुरात्मानमपि चापरे । पार्थभूतममन्यन्त जगत् कालेन मोहिता: ।। महाराज! आपके सैनिकोंको सब ओर अर्जुन-ही-अर्जुन दिखायी देते थे। वे बार-बार “अर्जुन यह है, अर्जुन कहाँ है? अर्जुन वह खड़ा है” इस प्रकार चिल्ला उठते थे। इस भ्रममें पड़कर उनमेंसे कोई-कोई तो आपसमें और कोई अपनेपर ही प्रहार कर बैठते थे। उस समय कालके वशीभूत हो वे सारे संसारको अर्जुनमय ही देखने लगे थे। एकविशो< ध्याय: भीष्मके द्वारा द्रुपदके पुरोहितकी बातका समर्थन करते हुए अर्जुनकी प्रशंसा करना, इसके विरुद्ध कर्णके आक्षेपपूर्ण वचन तथा धुृतराष्ट्रद्वारा भीष्मकी बातका समर्थन करते हुए दूतको सम्मानित करके विदा करना वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचन श्रुत्वा प्रज्ञावृद्धों महाद्युति: । सम्पूज्यैनं यथाकालं भीष्मो वचनमबत्रवीत्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! पुरोहितकी यह बात सुनकर बुद्धिमें बढ़े-चढ़े महातेजस्वी भीष्मने समयके अनुरूप उनकी पूजा करके इस प्रकार कहा-- अ-४#--कात द्ाविशोद्ध्याय: धृतराष्ट्रका संजयसे पाण्डवोंके प्रभाव और प्रतिभाका वर्णन करते हुए उसे संदेश देकर पाण्डवोंके पास भेजना धृतराष्ट्र रवाच प्राप्तानाहु: संजय पाण्डुपुत्रा- नुपप्लव्ये तान् विजानीहि गत्वा । अजातशत्रुं च सभाजयेथा दिष्ट्या55नहा स्थानमुपस्थितस्त्वम्
Vaiśampāyana uvāca | tasya tad vacanaṃ śrutvā prajñāvṛddho mahādyutiḥ | sampūjyainaṃ yathākālaṃ bhīṣmo vacanam abravīt ||
毗湿摩听罢其言——智慧老成、光辉赫奕者——先依时宜礼敬之,然后开口作答。毗湿摩以正法之道示人:纵在政局紧张之际,言辞亦当先以敬礼与合时之礼为先。
वैशम्पायन उवाच
Wise counsel in the Mahābhārata is framed by dharma: one should first honour the speaker and respond in a timely, appropriate manner. Respectful procedure (sampūjya, yathākālam) is presented as part of ethical speech.
Vaiśampāyana narrates that Bhīṣma hears the preceding statement, formally honours the person concerned, and then begins his reply—setting the stage for Bhīṣma’s evaluative counsel in the Udyoga Parva’s diplomatic context.