उलूकदूतवाक्यम् / Ulūka’s Message to the Pāṇḍavas
प्रतिपेदे हृषीकेश: शार्ड्ध च धनुरुत्तमम् । महातेजस्वी रुक््मीने द्रमसे विजय नामक धनुष पाया था। भगवान् श्रीकृष्णने अपने तेज और बलसे मुर दैत्यके पाशोंका उच्छेद करके भूमिपुत्र नरकासुरको जीतकर जब उसके यहाँसे अदितिके मणिमय कुण्डल वापस ले लिये और सोलह हजार स्त्रियों तथा नाना प्रकारके रत्नोंको अपने अधिकारमें कर लिया, उसी समय उन्हें शार्ड़् नामक उत्तम धनुष भी प्राप्त हुआ था || ७-८ है ।। रुक्मी तु विजयं लब्ध्वा धनुर्मेघनिभस्वनम्
vaiśampāyana uvāca | pratipede hṛṣīkeśaḥ śārṅgaṃ ca dhanur uttamam |
毗湿摩波耶那说道:赫利希凯沙(Hṛṣīkeśa,即圣奎师那)得到了名为“舍楞伽”(Śārṅga)的至上神弓。传说此弓是在他行正义之胜时归于其手:他斩断魔罗(Mura)所设之缚,征服地生的那罗迦苏罗(Narakāsura),夺回阿底提(Aditi)的宝石耳环,并将一万六千名女子与诸多珍宝纳入庇护;就在那时,他也获得了舍楞伽神弓。
वैशम्पायन उवाच