Rukmī’s Offer of Aid and Arjuna’s Refusal (रुक्मिप्रस्तावः—अर्जुनप्रत्याख्यानम्)
वयमेकस्य शृण्वाना महाबुद्धिमतो रणे । भवन्तस्तु पृथक् सर्वे स्वबुद्धिवशवर्तिन:,“वे बोले--हमलोग एक परम बुद्धिमान् पुरुषको सेनापति बनाकर युद्धमें उसीका आदेश सुनते और मानते हैं। परंतु आप सब लोग पृथक्-पृथक् अपनी ही बुद्धिके अधीन हो मनमाना बर्ताव करते हैं
他们说:“我们在战场上听从一位大智之人,立他为统帅,只遵其号令而行;而诸位却各自为政,人人随己之智而转,任意行事。”
वैशम्पायन उवाच