Vṛtra’s Cosmic Threat, Viṣṇu’s Upāya, and the Conditional Vulnerability
Udyoga-parva 10
यदि वृत्र॑ न हन्म्यद्य वज्चयित्वा महासुरम् । महाबलं महाकायं न मे श्रेयो भविष्यति,उस समय अत्यन्त दारुण संध्याकालका मुहूर्त उपस्थित था। भगवान् इन्द्रने परमात्मा श्रीविष्णुके वरदानका विचार करके सोचा--'यह भयंकर संध्या उपस्थित है, इस समय न रात है, न दिन है, अतः अभी इस वृत्रासुरका अवश्य वध कर देना चाहिये; क्योंकि यह मेरा सर्वस्व हर लेनेवाला शत्रु है। यदि इस महाबली, महाकाय और महान् असुर वृत्रको धोखा देकर मैं अभी नहीं मार डालता हूँ, तो मेरा भला न होगा'
yadi vṛtraṁ na hanmy adya vañcayitvā mahāsuram | mahābalaṁ mahākāyaṁ na me śreyo bhaviṣyati ||
沙利耶说道:“若我今日不以计胜那大阿修罗——力大无穷、身躯宏伟的弗利陀罗——而将其诛杀,则于我绝无善果。”
शल्य उवाच