Kośārtha-Rājadharma: Ethical Revenue Collection and Social Regulation (कोशार्थ-राजधर्मः)
जलौकावत् पिबेद् राष्ट्र मुदुनैव नराधिप: । व्याप्रीव च हरेत् पुत्रान् संदशेन्न च पीडयेत्,जैसे जोंक धीरे-धीरे शरीरका रक्त चूसती है, उसी प्रकार राजा भी कोमलताके साथ ही राष्ट्रसे कर वसूल करे। जैसे बाघधिन अपने बच्चेको दाँतसे पकड़कर इधर-उधर ले जाती है; परंतु न तो उसे काटती है और न उसके शरीरमें पीड़ा ही पहुँचने देती है, उसी तरह राजा कोमल उपायोंसे ही राष्ट्रका दोहन करे
jalaukāvat pibed rāṣṭraṃ mudunaiva narādhipaḥ | vyāghrīvaca haret putrān saṃdaśen na ca pīḍayet ||
毗湿摩说道:“君王应当温和地从国土中取赋税——如水蛭吸血,点滴而饮。又如母虎以齿衔幼崽,携之而行却不咬伤、不令其痛;统治者亦当以柔和之法‘汲取’国用,只取其应得,不使臣民受苦。”
भीष्य उवाच