Kṛṣṇa’s Dhyāna and the Prompt to Question Bhīṣma (कृष्णध्यानं भीष्मप्रश्नप्रेरणा च)
चतुर्थ ध्यानमार्ग त्वमालम्ब्य पुरुषर्षभ । अपक्रान्तो यतो देवस्तेन मे विस्मितं मन:,युधिष्ठिरे पूछा--अमितपराक्रमी, जगत्के आश्रयदाता पुरुषोत्तम! आप यह किसका ध्यान कर रहे हैं? यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है! इस त्रिलोकीका कुशल तो है न? आप तो जाग्रतू, स्वप्न, सुषुप्ति--तीनों अवस्थाओंसे परे तुरीय ध्यानमार्गका आश्रय लेकर स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे ऊपर उठ गये हैं। इससे मेरे मनको बड़ा आश्चर्य हो रहा है
caturtha-dhyāna-mārgaṁ tvam ālambya puruṣarṣabha | apakrānto yato devas tena me vismitaṁ manaḥ ||
尤提士提罗说:“噢人中雄牛,你依止第四禅道(图利耶,turīya),仿佛如神祇一般从寻常觉知中退隐;因此我心充满惊叹。”
युधिछिर उवाच