देवतापितृप्रश्नः — Nārada at Badarīāśrama: the ultimate referent of daiva and pitṛ worship
यो लुब्ध: सुभुशं प्रियानृतश्न मनुष्य: सततनिकृतिवज्चनाभिरति: स्यात् । उपनिधिभिरसुखकृत्स परमनिरयगो भृशमसुखमनुभवति दुष्कृतकर्मा,जो पुरुष अत्यन्त लोभी, असत्यसे प्रेम करनेवाला और सर्वदा कपटभरी बातें बनानेवाला और ठगाईमें रत है तथा जो तरह-तरहके साधनोंसे दूसरोंको दुःख देता है, वह पापात्मा घोर नरकमें पड़कर अत्यन्त दुःख भोगता है
yo lubdhaḥ subahuśaṃ priyānṛtaśna manuṣyaḥ satata-nikṛti-vañcanābhiratiḥ syāt | upanidhibhir asukha-kṛt sa parama-niraya-go bhṛśam asukham anubhavati duṣkṛta-karmā ||
毗耶娑说:若有人贪欲炽盛,喜爱悦耳的虚妄之言,恒常沉溺于欺诈与骗取,又以种种机巧使他人受苦——此等罪人因其恶业,将堕入最可怖的地狱,在彼处受尽极苦。
व्यास उवाच