Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
चतुर्लक्षणजं त्वाद्य॑ चतुर्वर्ग प्रचक्षते । व्यक्तमव्यक्तजं चैव तथा बुद्धमथेतरत् । सच्चं क्षेत्रज्ञ इत्येतद् द्वयमप्यनुदर्शितम्,अव्यक्त होते हुए भी जीवात्मा व्यक्तके सम्पर्कसे जन्म, वृद्धि, जरा और मृत्यु--इन चार लक्षणोंसे युक्त तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष--इन चार पुरुषार्थोंसे सम्बन्धित कहा जाता है। दूसरा अव्यक्त परमात्मा ज्ञानस्वरूप है। व्यक्त (जडवर्ग) की उत्पत्ति उसी अव्यक्त (परमात्मा) से होती है। व्यक्तको सत्त्व (जडवर्ग--श्षेत्र) तथा अव्यक्त जीवात्माको क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। इस प्रकार इन दोनोंहीका वर्णन किया गया है। वेदोंमें भी पूर्वोक्त दो आत्मा बताये गये हैं। विषयोंमें आसक्त हुआ जीवात्मा जब आसक्तिरहित होकर विषयोंसे निवृत्त हो जाता है, तब वह मुक्त कहलाता है। सांख्यवादियोंके मतमें यही मोक्षका लक्षण है
caturlakṣaṇajaṁ tvādya caturvarga pracakṣate | vyaktam avyaktajaṁ caiva tathā buddham athetarat || saccaṁ kṣetrajña ity etad dvayam apy anudarśitam |
毗耶娑说道:“原初之我(个我),虽为未显,却因与显相系,便被说为具四相——生、长、老、死——并与人之四义:法(dharma)、利(artha)、欲(kāma)、解脱(mokṣa)相连。显由未显而生;而未显之性,即是觉知与知识。于是呈现二重教说:‘有’(sat),被认作田(kṣetra,非知觉之聚合);以及知田者(kṣetrajña,有觉之我)。凭此辨别,解脱之道德旨趣便奠基于对诸境的离著。”
व्यास उवाच