Adhyāya 166: Kṛtaghna-doṣa (कृतघ्नदोषः) — the fault of ingratitude and the limits of expiation
भवेत्तु मानुषेष्वेवं प्रायश्ित्तमनुत्तमम् । दानं वा दानशक्तिषु सर्वमेतत् प्रकल्पयेत्,इस प्रकार मनुष्योंके लिये परम उत्तम प्रायश्चित्तका विधान है। उनमें जो दान करनेमें समर्थ हों, उनके लिये दानकी भी विधि है। यह सब प्रायश्चित्त विचारपूर्वक करना चाहिये
毗湿摩说道:如此,便是为人所立的最上等的忏悔法(prāyaścitta)。而对于有能力施与者,亦另有布施之法可行。凡此诸种,当审慎思量而后实行。
भीष्म उवाच