Adhyāya 166: Kṛtaghna-doṣa (कृतघ्नदोषः) — the fault of ingratitude and the limits of expiation
पुमांसमुन्नयेत् प्राज्ञ: शयने तप्त आयसे । अप्यादधीत दारूणि तत्र दहोत पापकृत्,इसी तरह व्यभिचारी पुरुषको बुद्धिमान् राजा लोहेकी तपायी हुई खाटपर सुलाकर ऊपरसे लकड़ी रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी उसीमें जलकर भस्म हो जाय। महाराज! पतिकी अवहेलना करके परपुरुषोंसे व्यभिचार करनेवाली स्त्रियोंके लिये भी यही दण्ड है, उपर्युक्त कहे हुएमें जिन दुष्टोंके लिये प्रायश्चित्त बताया है, उनके लिये यह भी विधान है कि एक वर्षके भीतर प्रायश्चित्त न करनेपर दुष्ट पुरुषको दूना दण्ड प्राप्त होना चाहिये। जो मनुष्य दो, तीन, चार या पाँच वर्षोतक उस पतित पुरुषके संसर्गमें रहे, वह मुनिजनोचित व्रत धारण करके उतने ही वर्षोतक पृथ्वीपर घूमता हुआ भिक्षावृत्तिसे जीवन- निर्वाह करे
pumāṁsam unnayet prājñaḥ śayane tapte āyase | apy ādadhīta dārūṇi tatra dahot pāpakṛt ||
毗湿摩说:明智的国王应惩治犯过的男子,使其卧于烧得炽热的铁床之上;再将柴薪堆覆其身,点火焚之,使罪人当场被烧。以同样的精神,那些轻慢丈夫、与他人通奸的女子,也被说应受同等刑罚。又,对于已规定须行赎罪法(prāyaścitta)的作恶者,亦有法度:若在一年之内不行赎罪,其刑当加倍。凡与此等堕落之人相交相处二年、三年、四年或五年者,当受持如牟尼般的誓戒,并以同样年数行脚于世,乞食而活。
भीष्म उवाच