Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
श्षपच उवाच यद् ब्राह्मणार्थे कृतमर्थितेन तेनर्षिणा तदवस्थाधिकारे | स वै धर्मो यत्र न पापमस्ति सर्वैरुपायैर्गुरवो हि रक्ष्या:,चाण्डालने कहा--महर्षि अगस्त्यने ब्राह्म॒णोंकी रक्षाके लिये प्रार्थना की जानेपर वैसी अवस्थामें वातापिका भक्षणरूप कार्य किया था (उनके वैसा करनेसे बहुतसे ब्राह्मणोंकी रक्षा हो गयी; अन्यथा वह राक्षस उन सबको खा जाता; अतः महर्षिका वह कार्य धर्म ही था)। धर्म वही है, जिसमें लेशमात्र भी पाप न हो। ब्राह्मण गुरुजन हैं; अतः सभी उपायोंसे उनकी एवं उनके धर्मकी रक्षा करनी चाहिये
śvapaca uvāca | yad brāhmaṇārthe kṛtam arthitena tenarṣiṇā tad avasthādhikāre | sa vai dharmo yatra na pāpam asti sarvair upāyair guravo hi rakṣyāḥ ||
食犬者说道:“那位仙人应人恳求,为护持婆罗门而行之事——在那特定的危急情势与条件之下所为——确属正当。达摩乃是毫无罪垢、纤尘不染之道。既然婆罗门是可敬的师长,就当竭尽一切方法护持他们及其达摩。”
श्षपच उवाच