Duryodhana-vadha-pratikriyā: Harṣa, Nindā, and Kṛṣṇa’s Nīti-vyākhyā (Śalya-parva 60)
(गत: पुरुषशार्दूलो हत्वा नैकृतिकं रणे । अधर्मो विद्यते नात्र यद् भीमो हतवान् रिपुम् ।। पुरुषसिंह भीम रणभूमिमें कपटी दुर्योधनको मारकर चले गये। उन्होंने जो अपने शत्रुका वध किया है, इसमें कोई अधर्म नहीं है। युद्धयन्तं समरे वीरं कुरुवृष्णियशस्करम् । अनेन कर्ण: संदिष्ट: पृष्ठतो धनुराच्छिनत् ।। इसी दुर्योधनने कर्णको आज्ञा दी थी, जिससे उसने कुरु और वृष्णि दोनों कुलोंके सुयशकी वृद्धि करनेवाले, युद्धपरायण, वीर अभिमन्युके धनुषको समरांगणमें पीछेसे आकर काट दिया था। ततः सछिन्नधन्वानं विरथं पौरुषे स्थितम् | व्यायुधीकृत्य हतवान् सौभद्रमपलायिनम् ।। इस प्रकार धनुष कट जाने और रथसे हीन हो जानेपर भी जो पुरुषार्थमें ही तत्पर था, रणभूमिमें पीठ न दिखानेवाले उस सुभद्राकुमार अभिमन्युको इसने निहत्था करके मार डाला था। जन्मप्रभृतिलुब्धश्न पापश्चैव दुरात्मवान् । निहतो भीमसेनेन दुर्बुद्धिः कुलपांसन: ।। यह दुरात्मा, दुर्बुद्धि एवं पापी दुर्योधन जन्मसे ही लोभी तथा कुरुकुल॒का कलंक रहा है, जो भीमसेनके हाथसे मारा गया है। प्रतिज्ञां भीमसेनस्य त्रयोदशसमार्जिताम् | किमर्थ नाभिजानाति युद्धयमानो5पि विश्रुताम् ।। भीमसेनकी प्रतिज्ञा तेरह वर्षोंसे चल रही थी और सर्वत्र प्रसिद्ध हो चुकी थी। युद्ध करते समय दुर्योधनने उसे याद क्यों नहीं रखा?। ऊर्ध्वमुत्क्रम्य वेगेन जिघांसन्तं वृकोदर: । बभज्ज गदया चोरू न स्थाने न च मण्डले ।।) यह वेगसे ऊपर उछलकर भीमसेनको मार डालना चाहता था। उस अवस्थामें भीमने अपनी गदासे इसकी दोनों जाँघें तोड़ डाली थीं। उस समय न तो यह किसी स्थानमें था और न मण्डलमें ही। संजय उवाच धर्मच्छलमपि श्रुत्वा केशवात् स विशाम्पते । नैव प्रीतमना रामो वचन प्राह संसदि,संजय कहते हैं--प्रजानाथ! भगवान् श्रीकृष्णसे यह छलरूप धर्मका विवेचन सुनकर बलदेवजीके मनको संतोष नहीं हुआ। उन्होंने भरी सभामें कहा--
sañjaya uvāca |
dharma-cchalam api śrutvā keśavāt sa viśāṃpate |
aiva prītamanā rāmo vacanaṃ prāha saṃsadi ||
三阇耶说道:“噢,民众之主!即便从凯沙瓦(奎师那)那里听到对达摩的阐释——其中含有微妙的权谋之计——罗摩(婆罗罗摩)内心仍不欢喜;于是他在满座大会中开口说道。”
संजय उवाच
The verse highlights a classic Mahabharata ethical problem: an action may be defended as ‘dharma’ through contextual reasoning or strategic necessity, yet a principled observer may still find it morally unsatisfying. It invites reflection on whether righteousness is rule-based or context-based, and who has authority to interpret it.
After Krishna explains (and effectively defends) a controversial act as a form of dharma, Balarama remains displeased and speaks in the assembly. This sets up a debate-like moment where differing moral sensibilities respond to the same wartime event.