
Vasiṣṭhāpavāha: Sarasvatī’s Diversion and Viśvāmitra’s Curse (वसिष्ठापवाहः)
Upa-parva: Vasiṣṭhāpavāha (Sarasvatī–Viśvāmitra–Vasiṣṭha Episode)
Janamejaya asks how the river Sarasvatī came to be known for the “apavāha” (diverting/carrying away) of Vasiṣṭha and what enmity caused it. Vaiśaṃpāyana explains the intense tapas-based rivalry between Viśvāmitra and Vasiṣṭha, whose āśramas lay near Sthāṇutīrtha, a site associated with divine rites and consecrations. Viśvāmitra, perceiving Vasiṣṭha’s radiance as superior, forms an intent to harm him and summons Sarasvatī in anger, commanding her to bring Vasiṣṭha quickly. Sarasvatī arrives distressed, fearing the consequences of disobeying either sage. She approaches Vasiṣṭha, who advises her to protect herself by carrying him swiftly, warning that Viśvāmitra may curse her. Seizing an opportunity, Sarasvatī causes a bank-eroding surge that lifts and carries Vasiṣṭha; Vasiṣṭha praises the river’s cosmic functions and she delivers him toward Viśvāmitra’s vicinity. When Viśvāmitra reaches for a weapon, Sarasvatī, fearing the sin of brahmin-killing, diverts Vasiṣṭha eastward, effectively deceiving Viśvāmitra to prevent harm. Enraged, Viśvāmitra curses Sarasvatī to carry blood-mixed water for a year. Sages and divine beings grieve at this condition, and the account concludes by noting the fame of the Vasiṣṭhāpavāha and Sarasvatī’s eventual return to her natural course.
Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय से कहते हैं—बलदेव की तीर्थयात्रा के प्रसंग में अब ‘अवाकीर्ण’ तीर्थ की महिमा सुनो, जहाँ क्रोध और तप के संयोग से एक ब्राह्मण का यज्ञ लोक-व्यवस्था को हिला देता है। → दाल्भ्य (बक दाल्भ्य) कठोर नियम में स्थित होकर धृतराष्ट्र के राष्ट्र पर क्रोधवश एक भयानक सत्र-यज्ञ आरम्भ करता है। यज्ञ विधिवत् चलता है, पर उसका फल ‘क्षय’ बनकर उतरता है—धृतराष्ट्र का राज्य क्रमशः क्षीण होने लगता है, मानो कुल्हाड़ी से वन कट रहा हो। भय और विस्मय फैलता है; यह तप-तेज धर्म का आवरण लिए हुए भी विनाश का उपकरण बनता दिखता है। → जब राज्य-क्षय असह्य हो उठता है और संकट में फँसा ‘अवाकीर्ण’ (व्यवकीर्ण) विवेकहीन-सा पड़ जाता है, तब दीनता से झुके हुए लोग/राजा ब्राह्मण के चरणों में गिरकर कहते हैं—“मैं दीन, लुब्ध, मूर्ख; आप ही मेरी गति, आप ही नाथ—प्रसाद कीजिए।” यही क्षण क्रोध-यज्ञ और करुणा-याचना का टकराव बनकर चरम पर पहुँचता है। → प्रसंग आगे ययाति की ओर मुड़ता है—ययाति के यज्ञ का वर्णन आता है, जहाँ दान की पराकाष्ठा से देव-गन्धर्व प्रसन्न होते हैं और मनुष्य विस्मित। ययाति ब्राह्मणों को मनोवांछित कामनाएँ/दान देता है; यज्ञ ‘क्षय’ नहीं, ‘सम्पदा’ और लोक-कल्याण का प्रतीक बनता है—यह तुलना बताती है कि यज्ञ का नैतिक स्वरूप कर्ता के भाव पर निर्भर है। → बलदेव की तीर्थयात्रा में ‘सारस्वतोपाख्यान’ की धारा आगे किन-किन तीर्थों और कथाओं से होकर गुज़रेगी—यह जिज्ञासा बनी रहती है।
Verse 1
०: ड-शक्ाझ एकचत्वारिशो< ध्याय: अवाकीर्ण और यायात तीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दाल्भ्यकी कथा और ययातिके यज्ञका वर्णन वैशम्पायन उवाच ब्रह्मययोनेरवाकीर्ण जगाम यदुनन्दन: । यत्र दाल्भ्यो बको राजन्नाश्रमस्थो महातपा:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
毗舍波耶那说:大王啊,雅度族之欢(婆罗罗摩)离开那能赐予婆罗门之位的圣渡之后,前往名为阿瓦吉尔那(Avākīrṇa)的圣地(tīrtha)。在那里,隐居的茅庵中住着达尔毗之子婆迦(Baka)——大苦行者,持法而有威势;他曾被滔天怒火所攫,行一严酷之仪,致使持国王(Dhṛtarāṣṭra)之国土遭逢毁灭。
Verse 2
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्र वैचित्रवीर्यिण: । तपसा घोररूपेण कर्षयन् देहमात्मन:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
Vaiśampāyana said: Overwhelmed by intense wrath, that righteous and mighty ascetic, emaciating his own body through dreadful austerities, performed a sacrificial oblation that consumed the kingdom of Dhṛtarāṣṭra, the son of Vicitravīrya. The verse underscores how anger, even when joined to ascetic power, can become a destructive force with far-reaching moral and political consequences.
Verse 3
पुरा हि नैमिषीयाणां सत्रे द्वादशवार्षिके,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
Vaiśaṃpāyana said: Long ago, at the twelve-year sacrificial session of the sages of Naimiṣa, a righteous and mighty ascetic, seized by intense anger, acted in a way that shows how even great spiritual power, when joined to wrath, can become destructive and morally consequential.
Verse 4
वृत्ते विश्वजितो<न्ते वै पज्चालानृषयो5गमन् । तत्रेश्वरमयाचन्त दक्षिणार्थ मनस्विन:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
Vaiśampāyana said: When the sacrifice of Viśvajit had concluded, sages from the land of the Pāñcālas arrived. There, with resolute minds, they requested the lord for a sacrificial gift (dakṣiṇā). But a righteous and mighty ascetic, seized by intense anger, became the pivotal presence in that setting—signaling how even religious contexts can be morally tested when passions like wrath intrude upon dharma.
Verse 5
पूर्वकालमें नैमिषारण्यनिवासी ऋषियोंने बारह वर्षोतक चालू रहनेवाले एक सत्रका आरम्भ किया था। जब वह पूरा हो गया, तब वे सब ऋषि विश्वजित् नामक यज्ञके अन्तमें पांचाल देशमें गये। वहाँ जाकर उन मनस्वी मुनियोंने उस देशके राजासे दक्षिणाके लिये धनकी याचना की ।। (तत्र ते लेभिरे राजन् पञ्चाले भ्यो महर्षयः) बलान्वितान् वत्सतरान् निर्व्याधीनेकविंशतिम् । तानब्रवीद् बको दाल्भ्यो विभजध्वं पशूनिति,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
Vaiśampāyana said: Long ago, the sages dwelling in Naimiṣāraṇya began a sacrificial session that continued for twelve years. When it was completed, they all went to Pāñcāla at the conclusion of a sacrifice called Viśvajit. There those high-minded seers asked the king of that land for wealth as the sacrificial fee. The Pāñcālas gave them twenty-one strong, healthy yearling calves. Then Baka, the son of Dālbhi—righteous and renowned, yet seized by great anger—said to them, “Divide these cattle among yourselves.” Vaiśampāyana continued: O king, after departing from that sacred ford which bestows the status of a brāhmaṇa, Balarāma, the delight of the Yadus, went to the Avākīrṇa Tīrtha. There, in an āśrama, the great ascetic Baka, son of Dālbhi—virtuous and powerful—overcome by fierce wrath, dried up his body through severe austerity and, as it were, ‘offered into the fire’ the realm of King Dhṛtarāṣṭra, the son of Vicitravīrya. The passage underscores how anger, even in the righteous, can become a destructive force, while sacred places and vows are portrayed as morally potent in shaping worldly outcomes.
Verse 6
एवमुकत्वा ततो राजन्नूषीन् सर्वान् प्रतापवान्,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
Vaiśampāyana said: “O King, having spoken thus, that mighty and radiant one then addressed all the sages. Overcome by intense anger—though righteous at heart and formidable in power—he spoke and acted under the force of that great wrath.”
Verse 7
स समीपगतो भूत्वा धृतराष्ट्रं जनेश्वरम्,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
毗舍摩耶那说:那位持守法义而威力卓绝者,走近人中之主——国王持国(Dhṛtarāṣṭra)。他被炽烈的大怒所笼罩,遂趋前相见。此颂揭示:即便奉行达摩、严于自持之人,一旦受激亦可能转而采取强硬之举,于是“正当的克制”与“愤怒的决断”之间便生出道德张力。
Verse 8
अयाचत पशाून् दाल्भ्य: स चैनं रुषितो5ब्रवीत् । यदृच्छया मृता दृष्टवा गास्तदा नृपसत्तम:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
毗舍摩耶那说:达尔毗耶(Dālbya)索求牛群;而对方动怒,出言相斥。那位最上之王见牛只不过因偶然而死,那位持法而有威德的苦行者便被大怒攫住。此段指出:当嗔恚压倒心志时,即便守达摩之人也会被驱使说出刻薄之语,并生起毁灭性的决断,从而酿成沉重后果。
Verse 9
एतान् पशून् नय क्षिप्रं ब्रह्मबन्धो यदीच्छसि । निकट जाकर दल्भ्यने कौरवनरेश धृतराष्ट्रसे पशुओंकी याचना की। यह सुनकर नृपश्रेष्ठ धृतराष्ट्र कुृपित हो उठे। उनके यहाँ कुछ गौएँ दैवेच्छासे मर गयी थीं। उन्हींको लक्ष्य करके राजाने क्रोधपूर्वक कहा--'ब्रह्मबन्धो! यदि पशु चाहते हो तो इन मरे हुए पशुओंको ही शीघ्र ले जाओ' || ७-८ $ ।। ऋषिस्तथा वच: श्रुत्वा चिन्तयामास धर्मवित्,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
毗舍摩耶那说:“若你果真想要牛群,噫,‘婆罗门之徒’(brahma-bandhu:徒有婆罗门之名而无婆罗门之行者),便速将这些牲畜带走!”此句以尖刻辱骂宣泄王怒,把请求化作羞辱,从而凸显对求乞者出以恶言的伦理过失——尤其当对方与神圣身份相关之时。
Verse 10
चिन्तयित्वा मुहूर्तेन रोषाविष्टो द्विजोत्तम:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
毗舍摩耶那说:他沉思片刻,那位最上婆罗门便为愤懑所攫。虽其心本守法义,且以苦行与威力而强盛,却仍被大怒所覆,遂生凶烈之决意——而在周遭叙事中,此怒终化为对一国施行的毁灭性祭仪。
Verse 11
स तूत्कृत्य मृतानां वै मांसानि मुनिसत्तम:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
毗舍摩耶那说:“噫,诸牟尼之最胜者!那位持法而威猛的苦行者,被炽烈大怒所攫,撕裂了死兽之肉。”
Verse 12
अवाकीर्णे सरस्वत्यास्तीर्थे प्रज्वजाल्य पावकम्,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था महाराज! सरस्वतीके अवाकीर्णतीर्थमें अग्नि प्रजलित करके महातपस्वी दल्भपुत्र बक उत्तम नियमका आश्रय ले उन मृत पशुओंके मांसोंद्वारा ही उनके राष्ट्रका हवन करने लगे
毗湿摩波耶那说:在萨拉斯瓦蒂河名为“阿瓦吉尔那”(Avākīrṇa)的圣渡口,那位持法而威猛的苦行者——为强烈的忿怒所攫——点燃了祭火。叙事在此追忆:一位严厉修苦的圣者因怒火炽盛而行极烈之仪,象征性地将一国“献入”(焚尽于)祭火之中,昭示苦行(tapas)与祭仪之力若为嗔怒(krodha)驱使,便可能在伦理上险恶,并对社会秩序造成毁灭。
Verse 13
बको दाल्भ्यो महाराज नियमं परमं स्थित: । स तैरेव जुहावास्य राष्ट्र मांसैर्महातपा:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था महाराज! सरस्वतीके अवाकीर्णतीर्थमें अग्नि प्रजलित करके महातपस्वी दल्भपुत्र बक उत्तम नियमका आश्रय ले उन मृत पशुओंके मांसोंद्वारा ही उनके राष्ट्रका हवन करने लगे
毗湿摩波耶那说:大王啊,达尔毗耶之子婆迦(Baka)安住于至上誓戒,是一位大苦行者,持法而有威力。为强烈忿怒所驱,他点燃祭火,以死兽之肉为供品,竟将那王国本身作祭献而行火供。此段凸显苦行之力(tapas)与嗔怒(krodha)之间的道德张力:修持之威若被怒火挟持,便可转为毁灭之器。
Verse 14
तस्मिंस्तु विधिवत् सत्रे सम्प्रवृत्ते सुदारुणे । अक्षीयत ततो राष्ट्र धृतराष्ट्रस्य पार्थिव,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था राजन्! वह भयंकर यज्ञ जब विधिपूर्वक आरम्भ हुआ, तबसे धृतराष्ट्रका राष्ट्र क्षीण होने लगा
毗湿摩波耶那说:“大王啊,当那可怖而凶烈的长祭(satra)依仪轨如法开行之时,自那一刻起,持国王(Dhṛtarāṣṭra)的国土便开始衰耗。因为那位持法而威猛的苦行者——为大忿怒所驱——发动了一个其力足以吞噬邦国的仪式。”
Verse 15
ततः प्रक्षीयमाणं तद् राज्यं तस्य महीपते: । छिद्यमानं यथानन्तं वनं परशुना विभो,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था
毗湿摩波耶那说:于是那位君王的国土开始衰败——被削割如同无尽森林遭斧斤砍伐。那位持法而威猛的苦行者为大忿怒所压,给王国带来毁灭,昭示不受节制的嗔怒,即便出自奉法之人,也能化作吞噬整个邦国的力量。
Verse 16
दृष्टवा तथावकीर्ण तु राष्ट्र स मनुजाधिप:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था राजन! अपने राष्ट्रको इस प्रकार संकटमग्न हुआ देख वे नरेश मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए और गहरी चिन्तामें डूब गये। फिर ब्राह्मणोंक साथ अपने देशको संकटसे बचानेका प्रयत्न करने लगे
毗湿摩波耶那说:见自己的国土如此陷入败坏与混乱,那位人主心中悲恸,沉入深重忧思。随后他与婆罗门们一道,设法拯救国家脱离这场危难。
Verse 17
बभूव दुर्मना राजंश्विन्तयामास च प्रभु: । मोक्षार्थमकरोद्ू यत्नं ब्राह्मणैः सहित: पुरा,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था राजन! अपने राष्ट्रको इस प्रकार संकटमग्न हुआ देख वे नरेश मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए और गहरी चिन्तामें डूब गये। फिर ब्राह्मणोंक साथ अपने देशको संकटसे बचानेका प्रयत्न करने लगे
毗湿摩波耶那说道:“大王啊,那位主宰心神黯然,沉入忧惧的思虑之中。往昔为求解脱(mokṣa),他曾与婆罗门众同心竭力而行。虽内怀正法、威勇绝伦,却被滔天怒火所攫——由此发动之举,皆负沉重的道德因果,其后果亦将惨烈。”
Verse 18
न च श्रेयो5 ध्यगच्छत्तु क्षीयते राष्ट्रमेव च । यदा स पार्थिव: खिन्नस्ते च विप्रास्तदानघ,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था अनघ! जब किसी प्रकार भी वे भूपाल अपने राष्ट्रका कल्याण-साधन न कर सके और वह दिन-प्रतिदिन क्षीण होता ही चला गया, तब राजा और उन ब्राह्मणोंको बड़ा खेद हुआ
毗湿摩波耶那说道:“然而终究未得真正之善;国土本身却日渐凋敝。那位国王心灰意冷之时——婆罗门众亦同感哀惋,哦无垢者——那位内守正法、威力卓绝之人被大怒所制,遂行其事,竟使邦国走向覆亡。”
Verse 19
यदा चापि न शवक्नोति राष्ट्र मोक्षयितुं नृप अथ वै प्राश्निकांस्तत्र पप्रच्छ जनमेजय,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था नरेश्वर जनमेजय! जब धृतराष्ट्र अपने राष्ट्रको उस विपत्तिसे छुटकारा दिलानेमें समर्थ न हो सके, तब उन्होंने प्राश्निकों (प्रश्न पूछनेपर भूत, वर्तमान और भविष्यकी बातें बतानेवालों)-को बुलाकर उनसे इसका कारण पूछा
毗湿摩波耶那说道:“阇那美阇耶王啊,当持国王(Dhṛtarāṣṭra)自知无力使国土脱离那场灾厄时,便召来诸位‘普拉什尼迦’(prāśnika)——能以答问揭示过去、现在与未来之事者——询问其因。于此情境中,叙事追忆一位奉持正法而威力深厚的苦行者:他为大怒所制,以严酷的苦行(tapas)之力使邦国趋于毁灭;由此昭示,愤怒即便寄居于守法之人,若不加节制,亦能化作摧毁之力。”
Verse 20
ततो वै प्राश्निकाः प्राहुः पशोर्विप्रकृतस्त्वया । मांसैरभिजुहोतीदं तव राष्ट्र मुनिर्बक:,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था तब उन प्राश्चिकोंने कहा--'आपने पशुके लिये याचना करनेवाले बक मुनिका तिरस्कार किया है; इसलिये वे मृत पशुओंके मांसोंद्वारा आपके इस राष्ट्रका विनाश करनेकी इच्छासे होम कर रहे हैं
毗湿摩波耶那说道:“于是诸位占问者宣告:‘你曾冒犯了求取一兽的牟尼婆迦(Baka)。因此,那位奉法而威力深厚的苦行者——为炽烈大怒所驱——如今以肉为供,行火供(homa),意在毁灭你的国土。’”
Verse 21
तेन ते हूयमानस्य राष्ट्रस्यास्य क्षयो महान् । तस्यैतत् तपस: कर्म येन तेडद्य लयो महान्,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था “उनके द्वारा आपके राष्ट्रकी आहुति दी जा रही है; इसलिये इसका महान् विनाश हो रहा है। यह सब उनकी तपस्याका प्रभाव है, जिससे आपके इस देशका इस समय महान् विलय होने लगा है
毗湿摩波耶那说道:“正因你的国土仿佛被他投入火中作供献一般,此邦遂遭大毁灭。此乃其苦行(tapas)之业力所致——凭此威势,你今日已开始走向巨大的崩解。那位奉法而威力深厚的苦行者,为滔天怒火所驱,正以苦行之力造成这场覆亡。”
Verse 22
अपां कुज्जे सरस्वत्यास्तं प्रसादय पार्थिव । सरस्वतीं ततो गत्वा स राजा बकमब्रवीत्,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था 'भूपाल! सरस्वतीके कुंजमें जलके समीप वे मुनि विराजमान हैं, आप उन्हें प्रसन्न कीजिये।” तब राजाने सरस्वतीके तटपर जाकर बक मुनिसे इस प्रकार कहा
毗湿摩耶那说道:“大王,在萨拉斯瓦蒂河畔的林苑里,靠近水边,那位仙人正端坐其间——请前往求得他的欢心。”于是国王来到萨拉斯瓦蒂河边,向仙人婆迦(Baka)致辞。婆迦乃持法而有大威力的苦行者,却被滔天怒火所攫住——此段情节映照出苦行之力、嗔怒之势,与在趋近圣者时必须以恭敬与和解来求取恩许的道德张力。
Verse 23
निपत्य शिरसा भूमौ प्राउ्जलिर्भरतर्षभ । प्रसादये त्वां भगवन्नपराध॑ क्षमस्व मे,क्रोधेन महता5<विष्टो धर्मात्मा वै प्रतापवान् | वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति करानेवाले उस तीर्थसे प्रस्थित होकर यदुनन्दन बलरामजी “अवाकीर्ण' तीर्थमें गये, जहाँ आश्रममें रहते हुए महातपस्वी धर्मात्मा एवं प्रतापी दलभपुत्र बकने महान् क्रोधमें भरकर घोर तपस्याद्वारा अपने शरीरको सुखाते हुए विचित्रवीर्यकुमार राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रका होम कर दिया था भरतश्रेष्ठ! वे पृथ्वीपर माथा टेक हाथ जोड़कर बोले--“भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप मुझ दीन, लोभी और मूर्खतासे हतबुद्धि हुए अपराधीके अपराधको क्षमा कर दें। आप ही मेरी गति हैं। आप ही मेरे रक्षक हैं। आप मुझपर अवश्य कृपा करें!
毗湿摩耶那说道:“婆罗多族中的雄牛啊,他俯身叩地,额触尘土,合掌恭敬而言:‘世尊,我愿求得您的欢悦。请宽恕我的过失……’”
Verse 24
मम दीनस्य लुब्धस्य मौख्येण हतचेतस: । त्वं गतिस्त्वं च मे नाथ: प्रसादं कर्तुमहसि,भरतश्रेष्ठ! वे पृथ्वीपर माथा टेक हाथ जोड़कर बोले--“भगवन्! मैं आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ। आप मुझ दीन, लोभी और मूर्खतासे हतबुद्धि हुए अपराधीके अपराधको क्षमा कर दें। आप ही मेरी गति हैं। आप ही मेरे रक्षक हैं। आप मुझपर अवश्य कृपा करें!
“我卑微可怜,贪欲缠身,愚痴使我心神败坏。唯有您是我的归依;您是我的主宰与护佑者。愿您赐我慈恩。”
Verse 25
तं तथा विलपन्तं तु शोकोपहतचेतसम् | दृष्टवा तस्य कृपा जज्ञे राष्ट्र तस्थ व्यमोचयत्,राजा धृतराष्ट्रको इस प्रकार शोकसे अचेत होकर विलाप करते देख उनके मनमें दया आ गयी और उन्होंने राजाके राज्यको संकटसे मुक्त कर दिया
见他如此哀号,心神为悲痛所压,怜悯之情便生起;国王遂使其国度脱离困厄,解除所遭之患。
Verse 26
ऋषि: प्रसन्नस्तस्याभूत् संरम्भं च विहाय सः । मोक्षार्थ तस्य राज्यस्य जुहाव पुनराहुतिम्
毗湿摩耶那说道:仙人对他心生欢喜,舍弃一切躁动与嗔怒,又复举火献供(阿胡提),为求那位国王及其国土得解脱而行此仪轨。
Verse 27
ऋषि क्रोध छोड़कर राजापर प्रसन्न हुए और पुनः उनके राज्यको संकटसे बचानेके लिये आहुति देने लगे ।। मोक्षयित्वा ततो राष्ट्र प्रतिगृह्य पशून् बहून् । हृष्टात्मा नैमिषारण्यं जगाम पुनरेव सः,इस प्रकार राज्यको विपत्तिसे छुड़ाकर राजासे बहुत-से पशु ले प्रसन्नचित्त हुए महर्षि दाल्भ्य पुनः नैमिषारण्यको ही चले गये
如此解除了国土之危后,那位圣仙从国王处受纳了许多牛群作为赠礼。其心欢悦——怒意已释,所愿已遂——遂再度启程,返回奈弥沙林(Naimiṣāraṇya)。
Verse 28
धृतराष्ट्रोडपि धर्मात्मा स्वस्थचेता महामना: । स्वमेव नगरं राजन् प्रतिपेदे महर्द्धिमत्
毗舍波耶那说道:“大王啊,持国王亦然——内怀正法,心神安定,胸襟宏大——回到了他那辉煌富庶的都城。”
Verse 29
राजन्! फिर महामनस्वी धर्मात्मा धृतराष्ट्र भी स्वस्थचित्त हो अपने समृद्धिशाली नगरको ही लौट आये ।। तत्र तीर्थे महाराज बृहस्पतिरुदारधी: । असुराणामभावाय भवाय च दिवौकसाम्,महाराज! उसी तीर्थमें उदारबुद्धि बृहस्पतिजीने असुरोंके विनाश और देवताओंकी उन्नतिके लिये मांसोंद्वारा आभिचारिक यज्ञका अनुष्ठान किया था। इससे वे असुर क्षीण हो गये और युद्धमें विजयसे सुशोभित होनेवाले देवताओंने उन्हें मार भगाया
毗舍ṃ波耶那说道:“大王啊,胸怀高远、秉持正法的持国王,心神既定,又回到了自己那富庶的都城。在那处神圣渡口,大王啊,慧心宽宏的布里哈斯帕提曾以肉为供,举行阿毗遮利迦祭(ābhicārika,制敌之祭),为使阿修罗覆灭、令诸天兴盛。由此阿修罗衰弱,而在战场上以胜利光辉照耀的诸天击溃并驱逐了他们。”
Verse 30
मांसैरभिजुहावेष्टिमक्षीयन्त ततो<$सुरा: । दैवतैरपि सम्भग्ना जितकाशिभिराहवे,महाराज! उसी तीर्थमें उदारबुद्धि बृहस्पतिजीने असुरोंके विनाश और देवताओंकी उन्नतिके लिये मांसोंद्वारा आभिचारिक यज्ञका अनुष्ठान किया था। इससे वे असुर क्षीण हो गये और युद्धमें विजयसे सुशोभित होनेवाले देवताओंने उन्हें मार भगाया
毗舍波耶那说道:随后,以肉为供所行之阿毗遮罗(abhichāra,毁灭之术)起效,阿修罗便开始衰耗。大王啊,他们被诸天击溃、驱逐;诸天因战场胜利而光辉灿然,遂将其灭除。
Verse 31
तत्रापि विधिवद् दत्त्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशा: । वाजिन: कुग्जरांश्वैव रथांश्चाश्चतरीयुतान्,पृथ्वीनाथ! महायशस्वी महाबाहु बलरामजी उस तीर्थमें भी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक हाथी, घोड़े, खच्चरियोंसे जुते हुए रथ, बहुमूल्य रत्न तथा प्रचुर धन-धान्यका दान करके वहाँसे यायात तीर्थमें गये
在那里,声名显赫的(巴拉罗摩)亦依仪轨向婆罗门施赠:马匹、大象,以及四马驾驭的战车。
Verse 32
रत्नानि च महाहाणि धन धान्यं च पुष्कलम् | ययौ तीर्थ महाबाहुर्यायातं पृथिवीपते,पृथ्वीनाथ! महायशस्वी महाबाहु बलरामजी उस तीर्थमें भी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक हाथी, घोड़े, खच्चरियोंसे जुते हुए रथ, बहुमूल्य रत्न तथा प्रचुर धन-धान्यका दान करके वहाँसे यायात तीर्थमें गये
毗湿摩波耶那说:大王,臂力无双的婆罗罗摩在那神圣的渡口,依正法仪轨向婆罗门们施与大象、骏马、以骡驾车、珍贵宝石,以及丰厚的财物与谷粮;随后便启程前往名为“耶耶阿多圣渡”(Yāyāta-tīrtha)的圣地。
Verse 33
तत्र यज्ञे ययातेश्षन महाराज सरस्वती । सर्पि: पयश्च सुस्राव नाहुषस्य महात्मन:,महाराज! वहाँ पूर्वकालमें नहुषनन्दन महात्मा ययातिने यज्ञ किया था, जिसमें सरस्वतीने उनके लिये दूध और घीका स्रोत बहाया था
毗湿摩波耶那说:大王,在那位高贵的耶耶阿多——那呼沙之子、伟大之人——所行的祭祀中,萨拉斯瓦蒂河为他涌流出乳汁与酥油的清泉。
Verse 34
तत्रेष्टवा पुरुषव्याप्रो ययाति: पृथिवीपति: । अक्रामदूर्ध्व मुदितो लेभे लोकांश्व पुष्कलान्,पुरुषसिंह भूपाल ययाति वहाँ यज्ञ करके प्रसन्नतापूर्वक ऊर्ध्वलोकमें चले गये और वहाँ उन्हें बहुत-से पुण्यलोक प्राप्त हुए
毗湿摩波耶那说:在那里,耶耶阿多王——奋发如雄狮、为大地之主——依所规定的仪轨完成祭祀。欢欣之中,他升往上界,获得丰盛的功德之境。
Verse 35
पुनस्तत्र च राज्ञस्तु ययातेर्यजत: प्रभो: । औदार्य परम कृत्वा भक्ति चात्मनि शाश्वतीम्
而在那段叙述中,主又提及耶耶阿多王行祭之时:他以慷慨为至高准则,并在自身之内树立了恒久不移的虔敬(bhakti)。
Verse 36
यो यत्र स्थित एवेह आहूतो यज्ञसंस्तरे,राजाके यज्ञमण्डपमें बुलाकर आया हुआ जो ब्राह्मण जहाँ कहीं ठहर गया, वहीं उसके लिये सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने पृथक्-पृथक् गृह, शय्या, आसन, षड्रस भोजन तथा नाना प्रकारके दानकी व्यवस्था की
毗湿摩波耶那说:在那祭场之中,凡受邀而来参加国王祭祀的婆罗门,无论他在何处落座歇息,河流之最的萨拉斯瓦蒂便在其处为他一一安排:居所、卧榻、座席、具六味之食,以及种种布施之物。
Verse 37
तस्य तस्य सरिच्छेष्ठा गुहादिशयनादिकम् । षड़सं भोजन चैव दानं नानाविधं तथा,राजाके यज्ञमण्डपमें बुलाकर आया हुआ जो ब्राह्मण जहाँ कहीं ठहर गया, वहीं उसके लिये सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने पृथक्-पृथक् गृह, शय्या, आसन, षड्रस भोजन तथा नाना प्रकारके दानकी व्यवस्था की
毗舍波耶那说:凡被召至王家祭坛的婆罗门,无论他恰在何处歇宿——或如洞穴般的栖身处,或其他住处——诸河之最胜萨拉斯瓦蒂河都为他分别安排居所、卧榻与座位,并备齐六味之食与种种布施之礼。
Verse 38
ते मन्यमाना राज्ञस्तु सम्प्रदानमनुत्तमम् । राजानं तुष्टवुः प्रीता दत्त्वा चैवाशिष: शुभा:,उन ब्राह्मणोंने यह समझकर कि राजाने ही वह उत्तम दान दिया है, अत्यन्त प्रसन्न होकर राजा ययातिको शुभाशीर्वाद दे उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की
婆罗门们以为那无上的施与乃是国王亲自所赐,便欢喜满足,称颂国王;又献上吉祥祝祷,极力赞扬他。
Verse 39
तत्र देवा: सगन्धर्वा: प्रीता यज्ञस्य सम्पदा । विस्मिता मानुषाश्चासन् दृष्टवा तां यज्ञसम्पदम्,उस यज्ञकी सम्पत्तिसे देवता और गन्धर्व भी बड़े प्रसन्न हुए थे। मनुष्योंको तो वह यज्ञ- वैभव देखकर महान् आश्चर्य हुआ था
在那里,诸天与乾闼婆众因祭祀的丰盛荣华而欢喜。人间观者见此宏伟的祭仪气象,也都惊叹失色。
Verse 40
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापव॑में बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,ततस्तालकेतुर्महा धर्मकेतु- महात्मा कृतात्मा महादाननित्य: । वसिष्ठापवाहं महा भीमवेगं धृतात्मा जितात्मा समभ्याजगाम तदनन्तर महान् धर्म ही जिनकी ध्वजा है और जिनकी पताकापर ताड़का चिह्न सुशोभित है, वे महात्मा, कृतात्मा, धृतात्मा तथा जितात्मा बलरामजी, जो प्रतिदिन बड़े- बड़े दान किया करते थे, वहाँसे वसिष्ठापवाह नामक तीर्थमें गये, जहाँ सरस्वतीका वेग बड़ा भयंकर है
毗舍波耶那说:至此,《摩诃婆罗多》沙利耶篇(Śalya Parva)之棍棒分章(Gadā)中、关于巴拉德瓦朝圣行旅的“萨拉斯瓦塔传说”(Sārasvata)第四十章告终。其后,巴拉德瓦——以大法(dharma)为旗,旌幡饰以多罗树之徽,伟大之人,克己坚定,日日乐行大施——前往名为“婆悉吒流”(Vasiṣṭhāpavāha)的圣渡口;彼处萨拉斯瓦蒂河奔涌,势若惊雷,令人战栗。
Verse 56
पशूनेतानहं त्यक्त्वा भिक्षिष्ये राजसत्तमम् | राजन! वहाँ महर्षियोंने पांचालोंसे इक्कीस बलवान् और नीरोग बछड़े प्राप्त किये। तब उनमेंसे दल्भपुत्र बकने अन्य सब ऋषियोंसे कहा--“आपलोग इन पशुओंको बाँट लें। मैं इन्हें छोड़कर किसी श्रेष्ठ राजासे दूसरे पशु माँग लूँगा'
毗舍波耶那说:“我将舍下这些牲畜,去向最上之王乞求。”大王啊,当时诸大圣仙从般遮罗人处得了二十一头小牛,强健而无病。其间,达尔婆之子婆迦对众仙人说道:“你们把这些牲畜分了吧。我愿放弃它们,转而去投一位贤明之王,再求别的牛群。”
Verse 66
जगाम धृतराष्ट्रस्य भवन ब्राह्मणोत्तम: । नरेश्वर! उन सब ऋषियोंसे ऐसा कहकर वे प्रतापी उत्तम ब्राह्मण राजा धृतराष्ट्रके घरपर गये
毗舍波耶那说:他如此告诫诸位仙圣之后,那位声名显赫的至上婆罗门便前往持国王(Dhṛtarāṣṭra)的居所。
Verse 96
अहो बत नृशंसं वै वाक्यमुक्तो5स्मि संसदि । उनकी वैसी बात सुनकर धर्मज्ञ ऋषिने चिन्तामग्न होकर सोचा--“अहो! बड़े खेदकी बात है कि इस राजाने भरी सभामें मुझसे ऐसा कठोर वचन कहा है”
毗舍波耶那说:“唉!在王廷大会之中,我竟被人以极其残酷无情的话语相加。”听到那样的言辞,通晓法(dharma)的圣者忧思沉沉,叹息一位君王竟能在满朝众目之前说出如此刻薄之言。
Verse 103
मतिं चक्रे विनाशाय धृतराष्ट्रस्य भूपते: । दो घड़ीतक इस प्रकार चिन्ता करके रोषमें भरे हुए द्विजश्रेष्ठ दाल्भ्यने राजा धृतराष्ट्रके विनाशका विचार किया
毗舍波耶那说:卓越的婆罗门达尔毗耶(Dālbhyā)沉思片刻,怒火充盈,遂立下决意,要使持国王(Dhṛtarāṣṭra)走向毁灭。
Verse 116
जुहाव धृतराष्ट्रस्य राष्ट्र नरपते: पुरा । वे मुनिश्रेष्ठ उन मृत पशुओंके ही मांस काट-काटकर उनके द्वारा राजा धृतराष्ट्रके राष्ट्रकी ही आहुति देने लगे
毗舍波耶那说:往昔,在为持国王(Dhṛtarāṣṭra)之国土所行的一场祭仪中,诸位最上牟尼开始为那王国本身献上供献——只取已死之兽的肉,切成块块投入祭火。
Verse 156
बभूवापद्गतं तच्च व्यवकीर्णमचेतनम् । प्रभो! जैसे बड़ा भारी वन कुल्हाड़ीसे काटा जा रहा हो, उसी प्रकार उस राजाका राज्य क्षीण होता हुआ भारी आफतमें फँस गया, वह संकटग्रस्त होकर अचेत हो गया
毗舍波耶那说:那国度陷入灾厄,四散崩离,恍若失神——如同一片大森林正被斧刃砍伐。于是,国王的疆土日渐衰耗,困于重难;而他为忧苦所压,终于昏厥。
Verse 353
ददौ कामान् ब्राह्मुणेभ्यो यान् यान् यो मनसेच्छति । शक्तिशाली राजा ययाति जब वहाँ यज्ञ कर रहे थे, उस समय उनकी उत्कृष्ट उदारताको दृष्टिमें रखकर और अपने प्रति उनकी सनातन भक्ति देख सरस्वतीने उस यज्ञमें आये हुए ब्राह्मणोंको, जिसने अपने मनसे जिन-जिन भोगोंको चाहा, वे सभी मनोवांछित भोग प्रदान किये
毗湿摩波耶那说道:念及耶雅提王在行祭时卓绝的慷慨,又见其恒久不渝的虔敬,萨拉斯瓦蒂女神便在那场祭仪中,赐予前来赴会的婆罗门们各自心中所愿的一切享乐与恩赐——使所求皆得圆满。
Verse 412
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने एकचत्वारिंशो5ध्याय
至此,《圣摩诃婆罗多》之《沙利耶篇》(Śalya Parva)第四十一章告终——属“钉锤篇”(Gadāparvan)之内,记述婆罗提婆(Baladeva)巡礼诸圣渡(tīrtha)之行,尤以“萨拉斯瓦塔传”(Sārasvata 叙事)为此章所收。此结语(章末题记)标示一段教诲与追忆的圆满收束:它将前文置于更宏阔的伦理与仪礼图景之中,以朝圣、圣地地理与典范故事来阐释战争及其余波所承载的道德重量。
Sarasvatī is compelled by Viśvāmitra’s command yet seeks to prevent an act that would incur brahmahatyā; she must choose an action that minimizes irreversible harm while managing the threat of competing curses.
Anger-driven intent distorts judgment and propagates secondary harms; by contrast, harm-prevention—even through tactical redirection—can be framed as a dharmic priority when the alternative is an extreme transgression.
No explicit phalaśruti formula appears in the provided verses; the meta-function is etiological—explaining the well-known “Vasiṣṭhāpavāha” designation and embedding moral causality into tīrtha memory.