Sauptika Parva, Adhyaya 8 — Dhṛṣṭadyumna-vadha and the Camp’s Nocturnal Rout
अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्र विहाय भयमात्मन: । ऐसा कहकर द्रोणकुमार पाण्डवोंके विशाल शिविरमें बिना दरवाजेके ही कूदकर घुस गया। उसने अपने जीवनका भय छोड़ दिया था,मुक्ता: पर्यपतन् राजन् मृद्नन्त: शिबिरे जनम् | राजन! मारे जानेवाले योद्धाओंका आर्तनाद सुनकर हाथी और घोड़े भयसे थर्रा उठे और बन्धनमुक्त हो शिविरमें रहनेवाले लोगोंको रौंदते हुए चारों ओर दौड़ लगाने लगे ।। ९५ “| तैस्तत्र परिधावद्धिश्चवरणोदीरितं रज:
advāreṇābhyavaskandya vihāya bhayam ātmanaḥ | muktāḥ paryapatan rājan mṛdnantaḥ śibire janam |
三阇耶说道:德罗那之子从一处无门之隙纵身跃入,闯进般度族那广阔的营地,已将自身性命之惧尽数抛却。于是,哦大王,象与马因听见将士被屠戮时的惨号而惊惶失措,挣断缰绳脱离束缚,在营中践踏众人,向四方狂奔。此景昭示:战争之暴烈并不止于交锋者,恐慌一旦释放,便会无差别地殃及无助之人。
संजय उवाच