Aśvatthāmā’s Stuti of Rudra and Śiva’s Empowerment (सौप्तिकपर्व, अध्याय ७)
कितनोंने बाजूबंदोंके स्थानमें बड़े-बड़े सर्प धारण कर रखे थे। कितने ही विचित्र आभूषणोंसे विभूषित थे, बहुतोंके शरीर धूलि-धूसर हो रहे थे। कितने ही अपने अंगोंमें कीचड़ लपेटे हुए थे। उन सबने श्वेत वस्त्र और श्वेत फ़ूलोंकी माला धारण कर रखी थी ।। नीलाजड़्ा: पिड़लाड्राश्न मुण्डवक्त्रास्तथैव च | भेरीशड्खमृदड्ांश्ष झर्सरानकगोमुखान्,कितनोंके अंग नील और पिंगलवर्णके थे। कितनोंने अपने मस्तकके बाल मुँड़वा दिये। कितने ही सुनहरी प्रभासे प्रकाशित हो रहे थे। वे सभी पार्षद हर्षसे उत्फुल्ल हो भेरी, शंख, मृदंग, झाँझ, ढोल और गोमुख बजा रहे थे। कितने ही गीत गा रहे थे और दूसरे बहुत-से पार्षद नाच रहे थे
nīlājaṭāḥ piṅgalāṅgāś ca muṇḍavaktrās tathaiva ca | bherīśaṅkhamṛdaṅgāṃś ca jharjharānakanagomukhān ||
三阇耶说道:那些随从之中,有的披着青色纠结的发绺,有的肢体呈黄褐之色,有的剃去头发。又有一些放射出金色的光辉。他们欢喜若狂,击大鼓、吹海螺,敲击mṛdaṅga,又奏起jharjhara、ānaka与gomukha诸乐器——有的高歌,更多的则起舞。此景呈现出围绕那一夜惨烈之事的凶猛而超世的庆典,昭示战争中所召唤的力量,纵使人间行径在伦理上幽暗,也能显得华丽而可怖。
संजय उवाच