Dhṛtarāṣṭra’s Counsel on Restraint and the Pāṇḍavas’ Authorized Return (धृतराष्ट्र-उपदेशः)
वैशम्पायन उवाच एवमुक्ते तु वचने धर्मराजेन धीमता । धिग्धिगित्येव वृद्धानां सभ्यानां नि:ःसृता गिर:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! बुद्धिमान् धर्मराजके ऐसा कहते ही उस सभामें बैठे हुए बड़े-बूढ़े लोगोंके मुखसे “धिक्कार है, धिक््कार है” की आवाज आने लगी
毗湿摩波耶那说道:阇那梅阇耶王啊,智者法王说出此言之际,殿中长老与诸座上宾齐声发出:“可耻!可耻!”的呼喊。
वैशम्पायन उवाच