सभा-पर्व, अध्याय 56: विदुरस्य द्यूत-निन्दा
Vidura’s Censure of Dicing and Warning to the Kurus
वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी दैवं मत्वा परमं दुस्तरं च । शशासोच्चै: पुरुषान् पुत्रवाक्ये स्थितो राजा दैवसम्मूढचेता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्रने दैवको परम दुस्तर माना और दैवके प्रतापसे ही उनके चित्तपर मोह छा गया। वे कर्तव्याकर्तव्यका निर्णय करनेमें असमर्थ हो गये। फिर पुत्रकी बात मानकर उन्होंने सेवकोंको आज्ञा दी कि शीघ्र ही तत्पर होकर तोरणस्फाटिक नामक सभा तैयार कराओ। उसमें सुवर्ण तथा वैदूर्यसे जटित एक हजार खम्भे और सौ दरवाजे हों। उस सुन्दर सभाकी लंबाई और चौड़ाई एक- एक कोसकी होनी चाहिये
vaiśampāyana uvāca | evam uktvā dhṛtarāṣṭro manīṣī daivaṁ matvā paramaṁ dustaraṁ ca | śaśāsa uccaiḥ puruṣān putravākye sthito rājā daivasammūḍhacetāḥ ||
毗湿摩耶那说:说罢此言,智者持国王以“天命”(daiva)为至上且难以抗拒之力;其威势使他内心迷乱,失却对当为与不当为的明辨。随后,他依从儿子的言辞,高声命令侍从立刻行动。
वैशम्पायन उवाच