अर्जुनस्योत्तरदिग्विजयः
Arjuna’s Northern Conquests and Tribute Collection
दुर्निरीक्ष्यो हि भूतानां तेजसा भ्यधिकं॑ बभौ । आदित्य इव मध्याह्ले सहस्रकिरणावृत:,अब वह उत्तम ध्वज सहस्रों किरणोंसे आवृत मध्याह्नकालके सूर्यकी भाँति अपने तेजसे अधिक प्रकाशित होने लगा। प्राणियोंक लिये उसकी ओर देखना कठिन हो गया। वह वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं था, अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा कटता नहीं था। राजन्! वह दिव्य और श्रेष्ठ ध्वज इस लोकके मनुष्योंको दृष्टिगोचर मात्र होता था
durnirīkṣyo hi bhūtānāṃ tejasā bhyadhikaṃ babhau | āditya iva madhyāhne sahasrakiraṇāvṛtaḥ ||
毗舍波耶那说道:那旗幡令众生难以直视,因为它燃放出超越一切的光辉——如同正午之日,被千道光芒所笼罩。
वैशम्पायन उवाच