संजातप्रत्ययो$तीव वीक्ष्य चैवं पुनः पुन: । प्रशशंस नरव्यात्रावुभी माधवपाण्डवौ,उसका कवच छिजन्न-भिन्न हो गया था और सारा शरीर बाणोंसे विदीर्ण हो चुका था। उस अवस्थामें पुत्रसहित मरे हुए कर्णको देखकर बारंबार उसका निरीक्षण करके राजा युधिष्ठिरको इस बातपर पूरा-पूरा विश्वास हुआ। फिर वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे
sañjātapratyayo ’tīva vīkṣya caivaṁ punaḥ punaḥ | praśaśaṁsa naravyāghrāv ubhī mādhavapāṇḍavau ||
他一再观看,心中便生起极深的确信。随即他盛赞两位英雄——摩陀婆(克里希那)与般度之子(阿周那)——称其为人中之虎。此等确信,源于见迦尔那与其子同死,并洞察此役之决断结局仿佛受神意引导,因而不得不承认他们的神勇与更大的正法秩序相契。
संयज उवाच