Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
ततो मय: स्वतपसा चक्रे धीमान् पुराणि च | त्रीणि काञ्चनमेकं वै रौप्यं कार्ष्णायसं तथा,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे तब बुद्धिमान् मयासुरने अपनी तपस्याद्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया। उनमेंसे एक सोनेका, दूसरा चाँदीका और तीसरा पुर लोहेका बना था
tato mayaḥ svatapasā cakre dhīmān purāṇi ca | trīṇi kāñcanam ekaṃ vai raupyaṃ kārṣṇāyasaṃ tathā | nibodha manasā cātra na te kāryā vicāraṇā |
杜尤陀那说道:“随后,智者摩耶凭自身苦行之力,铸成坚固之城三座:一为黄金,一为白银,一为黝黑之铁。以坚定之心细听;切莫疑惑。”
दुर्योधन उवाच