अध्याय ८० — मध्यंदिन-रणवृत्तान्तः
Yudhiṣṭhira–Śrutāyu encounter; Cekitāna–Gautama clash; Abhimanyu pressure; Arjuna’s redeployment
न संवारयितुं शक्ता तव सेना जनाधिप । मदमूर्च्छान्वितात्मा वै प्रमदेवाध्वनि स्थिता,जनेश्वर! आपकी सेना भीमसेनके भयसे व्याकुल और धूृष्टद्युम्नके बाणोंसे मोहित हो रही थी। अतः आक्रमण करनेवाले अभिमन्यु आदि महाधनुर्धर वीरोंको वह रोकनेमें समर्थ न हो सकी। मद और मूच्छाके वशीभूत हुई मतवाली स्त्रीकी भाँति वह मार्गमें चुपचाप खड़ी रही
na saṃvārayituṃ śaktā tava senā janādhipa | mada-mūrcchānvita-ātmā vai pramadevādhvani sthitā ||
三阇耶说道:人中之主啊,你的军队无力拦阻他们。其心为醉狂与昏沉所制,便如轻率失度的女子般立在道路上,不能遏止奔突而来的战士。此偈揭示:战场上一旦纪律与清明尽失,再大的军势也会沦为被动的障碍,而不再是护卫之力。
संजय उवाच