Bhīṣma’s Stuti of Keśava and Counsel on Nara–Nārāyaṇa (भीष्म-स्तवः; नरनारायण-प्रसङ्गः)
ततः प्रहस्याद्भुतविक्रमेण गाण्डीवमुक्तेन शिलाशितेन । विपाठजालेन महास्त्रजालं विनाशयामास किरीटमाली,तब किरीटधारी अर्जुनने हँसकर अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए गाण्डीव धनुषसे छोड़े और शिलापर रगड़कर तेज किये हुए विपाठ नामक बाणोंके समूहसे शत्रुओंके बड़े-बड़े अस्त्रोंके जालको छिलन्न-भिन्न कर दिया त॑ महौघमिवायान्तं खात् पतन्तमिवोरगम् । भ्रान्तावरणनिस्त्रिंशं कालोत्सृष्टमिवान्तकम् उस युद्धमें पाण्डवों तथा द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने मतवाले गजराजके समान पराक्रमी और सूर्यके समान दीप्तिमान् शलपुत्रको आते देखा। वह महान् वेगशाली जलप्रवाह, आकाशसे गिरते हुए सर्प तथा कालकी भेजी हुई मृत्युके समान जान पड़ता था। उसके हाथमें नंगी तलवार थी
tataḥ prahasyādbhuta-vikrameṇa gāṇḍīva-muktena śilāśitena | vipāṭha-jālena mahāstra-jālaṁ vināśayāmāsa kirīṭamālī ||
三阇耶说道:于是,戴冠的阿周那含笑示现奇绝神勇,以从甘狄婆弓射出、并在石上磨砺锋利的“毗帕陀”箭雨,击碎了敌军那张由强大神兵构成的巨大罗网。此景昭示:战阵之中,纪律化的技艺与清明的心志,足以化解看似压倒性的力量。
संजय उवाच