Daivī–Āsurī Sampad-Vibhāga (दैवी–आसुरी संपद्विभागः) | Division of Constructive and Destructive Dispositions
अभ्यासे5प्यसमर्थोडसि मत्कर्मपरमो भव । मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि,यदि तू उपर्युक्त अभ्यासमें भी असमर्थ है तो केवल मेरे लिये कर्म करनेके ही परायण हो जाः। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मोंको करता हुआ भी मेरी प्राप्तिरूप सिद्धिको ही प्राप्त होगाई
若你连此修习亦不能胜任,那么就以为我而行作为最高归依。即使只是为我而作诸业,你也将获得成就——得我之圆满。
अजुन उवाच