भीष्मस्य शरवर्षः — Bhīṣma’s Arrow-Storm and Kṛṣṇa’s Impulse to Intervene
महान्त्यनीकानि महासमुच्छूये ततस्तयो: पाण्डवर्धार्तराष्ट्रयो: । चकम्पिरे शड्खमृदड़निःस्वनै: प्रकम्पितानीव वनानि वायुना,उस महान संग्राममें पाण्डव तथा कौरवपक्षकी विशाल सेनाएँ शंख और मृदंगकी ध्वनियोंसे उसी प्रकार काँप रही थीं, जैसे वायुके वेगसे समूचा वन-प्रान्त हिलने लगता है। उस अमंगलजनक मुहूर्तमें नरेशों, हाथियों और अश्वोंसे परिपूर्ण हो परस्पर आक्रमण करती हुई उभय पक्षकी उन विशाल सेनाओंका भयंकर शब्द वायुसे विक्षुब्ध हुए समुद्रोंकी गर्जनाके समान जान पड़ता था
sañjaya uvāca | mahānty anīkāni mahāsamucchūye tatas tayoḥ pāṇḍava-dhārtarāṣṭrayoḥ | cakampire śaṅkha-mṛdaṅga-niḥsvanaiḥ prakampitānīva vanāni vāyunā ||
三阇耶说道:“随后,在那场大冲突中,般度与持国之子两军的浩大阵列翻涌而起;螺号的长鸣与战鼓的轰响,使之仿佛震颤——如同森林遭遇劲风而齐齐摇撼。于那不祥之刻,两军巨众,满布诸王、战象与骏马,彼此冲击,其可怖声势,宛如狂风搅动之海的怒吼。”
संजय उवाच