अग्निशाप-प्रसंगः
Agni’s Curse and the Restoration of Ritual Order
द्विजानामन्निहोत्रेषु यज्ञसत्रक्रियासु च । निरोंकारवषट्कारा: स्वधास्वाहाविवर्जिता:,उग्रश्रवाजी कहते हैं--महर्षियो! तदनन्तर अग्निदेवने कुछ सोच-विचारकर द्विजोंके अन्निहोत्र, यज्ञ, सत्र तथा संस्कारसम्बन्धी क्रियाओंमेंसे अपने-आपको समेट लिया। फिर तो अग्निके बिना समस्त प्रजा ३>कार, वषट्कार, स्वथा और स्वाहा आदिसे वंचित होकर अत्यन्त दुःखी हो गयी। तब महर्षिगण अत्यन्त उद्विग्न हो देवताओंके पास जाकर बोले --
dvijānām agnihotreṣu yajñasatrakriyāsu ca | nir oṁkāravaṣaṭkārāḥ svadhāsvāhāvivarjitāḥ ||
Śaunaka 说道:“在二度生者(dvija)的日常火供与诸祭、诸长会(satra)之仪中,神圣的诵辞遂告止息——不复有 oṁ 之音,不复有 vaṣaṭ 之呼,‘svadhā’ 与 ‘svāhā’ 的祈唤亦皆阙如。仪式失却阿耆尼之临在,众人便陷入深重忧苦。”
शौनक उवाच