Ananta-Śeṣa Tapas and the Bearing of the Earth (अनन्त-शेष-तपस् तथा महीधारणम्)
ततो नवत्या नवतीर्मुखानां कृत्वा महात्मा गरुडस्तरस्वी । नदी: समापीय मुखैस्ततस्तै: सुशीघ्रमागम्य पुनर्जवेन,तब वेगशाली महात्मा गरुडने अपने शरीरमें आठ हजार एक सौ मुख प्रकट करके उनके द्वारा नदियोंका जल पी लिया और पुनः बड़े वेगसे शीघ्रतापूर्वक वहाँ आकर उस जलती हुई आगपर वह सब जल उड़ेल दिया। इस प्रकार शत्रुओंको ताप देनेवाले पक्षवाहन गरुडने नदियोंके जलसे उस आगको बुझाकर अमृतके पास पहुँचनेकी इच्छासे एक दूसरा बहुत छोटा रूप धारण कर लिया
tato navatyā navatīr mukhānāṁ kṛtvā mahātmā garuḍas tarasvī | nadīḥ samāpīya mukhais tatas taiḥ suśīghram āgamya punaḥ javena ||
于是,大魂而迅捷的迦楼罗显化出九十乘九十张口;以诸口饮尽诸河之水,又以极快之速返还,将水倾注于烈焰之上。迦楼罗——灼敌者——以河水熄灭火障;为求近甘露,又化作更为细小的形体。
शौनक उवाच