Garuḍa–Śakra Saṃvāda and the Retrieval of Amṛta (गरुड–शक्र संवादः अमृत-अपहरण-प्रसङ्गः)
अचिन्त्यमनभिध्येयं सर्वभूतभयंकरम् । महावीर्यधरं रौद्रं साक्षादग्निमिवोद्यतम्,उनका स्वरूप ऐसा था, जो चिन्तन और ध्यानमें नहीं आ सकता था। वे समस्त प्राणियोंके लिये भय उत्पन्न कर रहे थे। उन्होंने अपने भीतर महान् पराक्रम धारण कर रखा था। वे बहुत भयंकर प्रतीत होते थे। जान पड़ता था, उनके रूपमें स्वयं अग्निदेव प्रकट हो गये हैं
acintyam anabhidhyeyaṁ sarvabhūtabhayaṅkaram | mahāvīryadharaṁ raudraṁ sākṣād agnim ivodyatam ||
其形不可思议,非观想与言诠所及,令一切众生心生怖畏。体内蕴藏无量威力,显得凶烈可畏——仿佛火神阿耆尼亲自现前,炽然腾起。
रौहिण उवाच