वैराग्निदीपनं चैव भृशमुद्वेगकारि च | सुव्रता चापि कल्याणी सर्वभूतेषु विश्रुता,यह सौतियाडाह वैरकी आगको भड़कानेवाला और अत्यन्त उद्घेगमें डालनेवाला है। समस्त प्राणियोंमें विख्यात और उत्तम व्रतका पालन करनेवाली कल्याणमयी अरुन्धतीने उन महात्मा वसिष्ठपर भी शंका की थी, जिनका हृदय अत्यन्त विशुद्ध है, जो सदा उनके प्रिय और हितमें लगे रहते हैं और सप्तर्षिमण्डलके मध्यमें विराजमान होते हैं। ऐसे धैर्यवान् मुनिका भी उन्होंने सौतियाडाहके कारण तिरस्कार किया था। इस अशुभ चिन्तनके कारण उनकी अंगकान्ति धूम और अरुणके समान (मंद) हो गयी। वे कभी लक्ष्य और कभी अलक्ष्य रहकर प्रच्छन्न वेषमें मानो कोई निमित्त देखा करती हैं
Mandapāla uvāca | vairāgnidīpanaṃ caiva bhṛśam udvegakāri ca | suvratā cāpi kalyāṇī sarvabhūteṣu viśrutā ||
曼达帕拉说道:“此事确会点燃仇怨之火,使人心大乱。就连吉祥的阿伦达蒂——为万类所闻,坚守高洁誓戒——也曾对大圣瓦西什塔生疑;他心地至净,恒为她的福祉而行,并在七仙之中熠熠生辉。因这般缘由,连那位忍耐的苦行者也曾遭人轻慢。”
मन्दपाल उवाच