Śārṅgaka-stuti to Agni during the Khāṇḍava Conflagration (शार्ङ्गक-स्तुतिः / अग्नि-स्तुतिः)
एतच्छुत्वा तु वचन त्वरितो हव्यवाहनः । कृष्णपार्थावुपागम्य यमर्थ त्वभ्यभाषत,नृपश्रेष्ठ॒ यह सुनकर हव्यवाहनने तुरंत श्रीकृष्ण और अर्जुनके पास आकर जो कार्य निवेदन किया, वह मैं तुम्हें पहले ही बता चुका हूँ। जनमेजय! अग्निका वह कथन सुनकर अर्जुनने इन्द्रकी इच्छाके विरुद्ध खाण्डववन जलानेकी अभिलाषा रखनेवाले जातवेदा अग्निसे उस समयके अनुकूल यह बात कही
etac chrutvā tu vacanaṃ tvarito havyavāhanaḥ | kṛṣṇapārthāv upāgamya yam arthaṃ tv abhyabhāṣata ||
听罢此言,哈维耶瓦哈那(阿耆尼)立刻疾行而去。走近黑天与帕尔塔(阿周那),说明了自己此来之意。
वैशम्पायन उवाच