Kuntī’s Benediction to Draupadī and the Alliance Gifts (कुन्त्याः स्नुषाशीर्-वचनम् तथा दान-प्रतिग्रहः)
अगस्त्यशास्तामभितो दिशं तु शिरांसि तेषां कुरुसत्तमानाम् | कुन्ती पुरस्तात् तु बभूव तेषां पादान्तरे चाथ बभूव कृष्णा,उन कुरुश्रेष्ठ पाण्डवोंके सिर दक्षिण दिशाकी ओर थे। कुन्ती उनके मस्तककी ओर और द्रौपदी पैरोंकी ओर पृथ्वीपर ही पाण्डवोंके साथ सोयी, मानो उन कुशासनोंपर वह उनके पैरोंकी तकिया बन गयी। वहाँ उस परिस्थितिमें रहकर भी द्रौपदीके मनमें तनिक भी दुःख नहीं हुआ और उसने उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंका किंचिन्मात्र भी तिरस्कार नहीं किया
agastyaśāstām abhito diśaṃ tu śirāṃsi teṣāṃ kurusattamānām | kuntī purastāt tu babhūva teṣāṃ pādāntare cātha babhūva kṛṣṇā ||
毗湿摩耶那说道:那些库鲁族中的至杰者,枕首皆向南方——那由阿伽斯提耶所主的方位。昆蒂卧于其前,靠近他们的头侧;而黑公主克利须那(德劳帕蒂)则卧在地上,于他们足边,仿佛在库沙草席上化作承足之枕。即便身处如此境况,德劳帕蒂心中也无丝毫忧苦,更不曾对那些英勇的库鲁人显露半点轻慢。
वैशम्पायन उवाच