अर्जुनो धनुषो<भ्याशे तस्थौ गिरिरिवाचल: । स तद् धनुः परिक्रष्य प्रदक्षिणमथाकरोत्,इस प्रकार जब ब्राह्मणलोग भाँति-भाँतिकी बातें कर रहे थे, उसी समय अर्जुन धनुषके पास जाकर पर्वतके समान अविचलभावसे खड़े हो गये। फिर उन्होंने धनुषके चारों ओर घूमकर उसकी परिक्रमा की
阿周那立于弓旁,巍然不动如山。随后他趋前,行右绕之礼,绕弓一周以示敬奉。
वैशम्पायन उवाच