कल्माषपाद-शाप-कारणम्
Cause of Kalmāṣapāda’s Niyoga under a Curse
(स्तुतो5स्मि वरदस्ते5हं वरं वरय सुव्रत । स्तुतिस्त्वयोक्ता भक्तानां जप्येयं वरदो<5स्म्यहम् ।।) “उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! तुमने जो मेरा स्तवन किया है, इसके लिये मैं तुम्हें वर देनेको उद्यत हूँ, कोई वर माँगो। तुम्हारे द्वारा कही हुई वह स्तुति भक्तोंके लिये निरन्तर जप करनेयोग्य है। मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ। एवमुक्त: स तेनर्षिवसिष्ठ: प्रत्यभाषत । प्रणिपत्य विवस्वन्तं भानुमन्तं महातपा:,उनके यों कहनेपर महातपस्वी मुनिवर वसिष्ठ मरीचि-माली भगवान् भास्करको प्रणाम करके इस प्रकार बोले
stuto 'smi varadas te 'haṃ varaṃ varaya suvrata | stutis tvayoktā bhaktānāṃ japyeyam varado 'smy aham ||
“你已赞颂于我,我亦愿赐你恩愿。持善誓之圣者啊,择你所欲之福。你所诵之赞歌,堪为信众恒常持诵之咒;我确是施愿者。” 闻此言,大苦行者婆悉吒向光辉的毗婆斯万俯首礼拜,遂将开口作答。
(वसिष्ठ उवाच