Adhyāya 136: Yavakrī–Bharadvāja Saṃvāda and the Bāladhī–Dhanuṣākṣa Gāthā
Arrogance, Boons, and Nimitta
ह... “+(>) #:६-3 #2६.० - यहाँ अष्टावक्रजीने परोक्षरूपमें ही प्रश्नका उत्तर दिया है। भाव यह है कि दो तत्त्व, जिनको वैदिक भाषामें रयि और प्राणके नामसे कहा है (देखिये प्रश्नोपनिषद् १।४) एवं अंग्रेजीमें जिनको पोजिटिव (अनुलोम) और निगेटिव (प्रतिलोम) कहते हैं, स्वभावसे ही संयुक्त रहनेवाले हैं। इनका ही व्यक्त रूप विद्युत-शक्ति है। उसे गर्भकी भाँति मेघ धारण किये रहता है। संघर्षसे वह प्रकट होती है और आकर्षण होनेपर बाजकी भाँति गिरती है। जहाँ गिरती है वहाँ सबको भस्म कर देती है; इसलिये यह कहा गया कि वह कभी आपके शत्रुओंके घरपर भी न पड़े। इन दो तत्त्वोंकी संयुक्त शक्तिसे ही मेघकी उत्पत्ति होती है। इसलिये यह कहा गया कि उस मेघरूप गर्भको ये उत्पन्न करते हैं। $- ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास। २- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। ३- पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर। ४- हस्व, दीर्घ, प्लुत और हल्। ५- परा, पश्यन्ती मध्यमा और वैखरी--ये वाणीके चार पैर हैं। ६- आठ-आठ अक्षरके पाँच पादोंसे पंक्तिछन्दकी सिद्धि होती है। ७- त्वचा, श्रोत्र, नेत्र, रसना और नासिका--ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। ८- पंचचूड़ा अप्सराका उल्लेख महाभारतके अनुशासनपर्वमें ३८वें अध्यायमें भी आया है। ९- विपाशा (व्यास), इरावती (रावी), वितस्ता (झेलम), चन्द्रभागा (चिनाव) और शतद्रू (शतलज) ये ही पञ्चनद प्रदेशकी पाँच नदियाँ हैं। ३- हिरन, शूकर, खरगोश, गीदड़ आदि जन्तुओंका ग्रहण मृग नामसे ही हो जाता है। २- सप्तर्षि ये हैं-- मरीचिरड्िराश्षात्रि: पुलस्त्य: पुलह: क्रतु: । वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ।। (महा० शान्ति० ३४०।६९) “(भगवानने स्वयं ब्रह्माजीसे कहा है कि) मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ--ये सातों महर्षि तुम्हारे (ब्रह्माजीके) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं।' 3- धरो ध्रुवश्च सोमश्न अहश्वैवानिलोडनल: । प्रत्यूषश्न प्रभासश्व॒ वसवोडष्टौ प्रकीर्तिता: ।। (महा० आदि० ६६।१८) “धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास--ये आठ वसु कहे गये हैं।' ४- यथा रोगी, दरिद्र, शोकार्त्त, राजदण्डित, शठ, खल, वृत्तिसे वंचित, उन्मत्त, ई्ष्यापरायण और कामी >-ये दस निन्दक होते हैं। जैसा कि निम्नांकित श्लोकसे सिद्ध होता है--“आमयी दुर्मतः शोकी दण्डितश्न शठ: खल: । नष्टवृत्तिर्मदी चेष्यीं कामी च दश निन्दका: ॥। ” (इति नीतिशास्त्रोक्ति:) ५- उन दसों अवस्थाओंके नाम इस प्रकार हैं--गर्भवास, जन्म, बाल्य, कौमार, पौगण्ड, कैशोर, यौवन, प्रौद़, वार्द्धक्य तथा मृत्यु। ६- अध्यापक, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, राजा, मामा, श्वशुर, नाना, दादा, अपनेसे बड़ी अवस्थावाले कुट॒म्बी तथा पितृव्य (चाचा-ताऊ)--ये दस पूजनीय पुरुष माने गये हैं। जैसा कि कूर्मपुराणका वचन है--उपाध्याय: पिता ज्येष्ठश्राता चैव महीपति: । मातुल: श्वशुरश्वैव मातामहपितामहौ ।। बन्धुर्जेष्ठ: पितृव्यश्न पुंस्येते गुरवो मता: ।। ३- वाक्य बोलना, ग्रहण करना, चलना-फिरना, मलत्याग करना और मैथुनजनित सुखका अनुभव करना--ये पाँच कर्मेन्द्रियोंके विषय हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध--ये पाँच ज्ञानेन्द्रियोंके विषय हैं और इन सबका मनन--मनका विषय है। इस प्रकार कुल मिलाकर ग्यारह विषय हैं। २- काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद-मत्सर, हर्ष-शोक, राग-द्वेष और अहंकार--ये ग्यारह विकार होते हैं। 3- एकादश रुद्र ये हैं-- मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्क्रतिश्ष महायशा: । अजैकपादहिर्बु धन्य: पिनाकी च परंतप: ।। दहनोअथेश्वरश्वैव कपाली च महाद्युति: । स्थाणुर्भवश्च भगवान् रुद्रा एकादश स्मृता: ।। (महाभारत आदि० ६६।२-३) “मृगव्याध, सर्प, महायशस्वी निर्क्रति, अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, शत्रु-संतापन पिनाकी, दहन, ईश्वर, परमकान्तिमान् कपाली, स्थाणु और भगवान् भव--ये ग्यारह रुद्र माने गये हैं।' ४- द्वादश आदित्य ये हैं-- धाता मित्रोडर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च । भगो विवस्वान् पूषा च सविता दशमस्तथा ।। एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते । (महा० आदि० ६५।१५-१६) “धाता, मित्र, अर्यमा, इन्द्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे गये हैं।' ५- नृसिंहपुराणमें यही बात कही गयी है--“युयुधे विष्णुना सार्ध त्रयोदश दिनान्यसौ ।” > उक्थ नाम यज्ञविशेषमें गाये जानेयोग्य सामको औक्थ्य कहते हैं। पजञ्चत्रिशदधिकशततमो< ध्याय: कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु लोगश उवाच एषा मधुविला राजन् समड्जा सम्प्रकाशते । एतत् कर्दमिलं नाम भरतस्याभिषेचनम्,लोमशजी कहते हैं--राजन्! यह मधुविला नदी प्रकाशित हो रही है। इसीका दूसरा नाम समंगा है और यह कर्दमिल नामक क्षेत्र है, जहाँ राजा भरतका अभिषेक किया गया था
lomaśa uvāca | eṣā madhuvilā rājan samaṅgā samprakāśate | etat kardamilaṃ nāma bharatasya abhiṣecanam ||
Lomaśa nói: “Tâu Đại vương, con sông mang tên Madhuvilā nay đã hiện ra trước mắt; nó cũng được gọi là Samaṅgā. Đây là vùng thánh địa tên Kardamila, chính nơi Vua Bharata đã được cử hành lễ quán đỉnh (abhiṣeka).”
लोगश उवाच
The passage frames sacred places as living repositories of dharmic memory: a tīrtha is not only a location but a reminder of righteous kingship and legitimate rule, marked by consecration (abhiṣeka) and continuity of tradition.
As the party travels on pilgrimage in the forest, the sage Lomaśa points out a river and identifies the surrounding region as Kardamila, notable because King Bharata’s royal consecration was performed there.