जामदग्न्यस्य विलापः, प्रतिज्ञा, क्षत्रिय-निग्रहः, दानयज्ञश्च
Jāmadagnya Rāma’s Lament, Vow, Kṣatriya Suppression, and Gifts
छः. “5 (>>) 2५.3 #25: > यहाँ कुछ प्रतियोंमें 'देवान' की जगह 'वेदान” पाठ मिलता है। उस दशामें यह अर्थ होगा कि “वेदोंको वशमें कर लिया।” परंतु वेदोंको वशमें करनेकी बात असंगत-सी लगती है। देवताओंको वशमें करना ही सुसंगत जान पड़ता है, इसलिये हमने “देवान” यही पाठ रखा है। काश्मीरकी देवनागरी लिपिवाली हस्तलिखित पुस्तकमें यहाँ तीन श्लोक अधिक मिलते हैं। उनसे भी “देवान” पाठका ही समर्थन होता है। वे श्लोक इस प्रकार हैं-- तं तप्यमानं ब्रह्मर्षिमूचुदेवा: सबान्धवा: । किमर्थ तप्यसे ब्रह्मन् कः काम: प्रार्थितस्तव ।। एवमुक्तः: प्रत्युवाच देवान् ब्रह्मर्षिसत्तम: । स्वर्गहेतोस्तपस्तप्ये लोकाश्र स्युर्ममाक्षया: ।। तच्छुत्वा वचन तस्य तदा देवास्तमूचिरे । नासंततेर्भवेल्लोकः कृत्वा धर्मशतान्यपि ।। स श्रुत्वा वचन तेषां त्रिदशानां कुरूद्वह ।। इन श्लोकोंद्वारा देवताओंके प्रकट होकर वरदान देनेका प्रसंग सूचित होता है, अतः ““““ततो देवान् नियमाद् वशमानयत्” यही पाठ ठीक है। सप्तदशाधिकशततमो< ध्याय: परशुरामजीका पिताके लिये विलाप और पृथ्वीको इक्कीस बार निःक्षत्रिय करना एवं महाराज युधिष्ठिरके द्वारा परशुरामजीका पूजन राम उवाच ममापराधात् तै: क्षुद्रैर्हतस्त्वं तात बालिशै: । कार्तवीर्यस्य दायादैर्वने मृग इवेषुभि:,परशुरामजी बोले--हा तात! मेरे अपराधका बदला लेनेके लिये कार्तवीर्यके उन नीच और पामर पुत्रोंने वनमें बाणोंद्वारा मारे जानेवाले मृगकी भाँति आपकी हत्या की है
rāma uvāca |
mamāparādhāt taiḥ kṣudrair hataḥ tvaṃ tāta bāliśaiḥ |
kārtavīryasya dāyādair vane mṛga iveṣubhiḥ ||
Rama (Paraśurāma) nói: “Ôi, thưa Cha! Vì lỗi của chính con mà Cha đã bị những kẻ hèn mọn, ngu muội ấy—những người thừa tự của Kārtavīrya—giết trong rừng này, như con nai bị mũi tên hạ gục.”
राम उवाच