Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
ऑपन--माजल छा असल षट्त्रिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति व्यास उवाच अथ चेदू रोचयेदेतदुह्मेत स्रोतसा यथा । उन्मज्जंश्न॒ निमज्जंश्व ज्ञानवान् प्लववान् भवेत्,व्यासजी कहते हैं--वत्स! मनुष्य जिस प्रकार डूबता-उतराता हुआ जलके प्रवाहमें बहता रहता है और यदि संयोगवश कोई नौका मिल गयी तो उसकी सहायतासे पार लग जाता है, उसी प्रकार संसार-सागरमें डूबता-उतराता हुआ मानव यदि इस संकटसे मुक्त होना चाहे तो उसे ज्ञानरूपी नौकाका आश्रय लेना चाहिये
Vyāsa uvāca: atha ced yo rocayed etad uhyeta srotasā yathā | unmajjaṁś ca nimajjaṁś ca jñānavān plavavān bhavet ||
Vyāsa nói: Nếu một người chọn con đường này (con đường của tri kiến), thì—như kẻ bị dòng sông cuốn đi, hết nổi lên rồi lại chìm xuống—giữa dòng chảy của cõi thế, người có trí sẽ như kẻ có thuyền trong tay, đủ sức vượt qua bờ bên kia.
व्यास उवाच