Shloka 10

५ तथा ५,६) अर्थात्‌ “क्योंकि उसके प्राण उत्क्रान्तिको नहीं प्राप्त होते--शरीरसे निकलकर अन्यत्र नहीं जाते, “यहींपर लीन हो जाते हैं', “वह ब्रह्म हुआ ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है।' २. यहाँ “ब्रह्म” शब्द सगुण परमेश्वरका वाचक है। उनके कभी नाश न होनेवाले नित्य धाममें, जिसे सत्यलोक, परमधाम, साकेतलोक, गोलोक, वैकुण्ठलोक आदि नामोंसे कहा है, पहुँचकर भगवानूको प्रत्यक्ष कर लेना ही उनको प्राप्त होना है। ३. यहाँ 'धूम:” पद धूमाभिमानी देवताका अर्थात्‌ अन्धकारके अभिमानी देवताका वाचक है। उसका स्वरूप अन्धकारमय होता है। अग्नि-अभिमानी देवताकी भाँति पृथ्वीके ऊपर समुद्रसहित समस्त देशमें इसका भी अधिकार है तथा दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाले साथकोंको रात्रि-अभिमानी देवताके पास पहुँचा देना इसका काम है। दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाला जो साधक दिनमें मर जाता है उसे यह दिनभर अपने अधिकारमें रखकर रात्रिका आरम्भ होते ही रात्रि- अभिमानी देवताको सौंप देता है और जो रात्रिमें मरता है, उसे तुरंत ही रात्रि-अभिमानी देवताके अधीन कर देता है। ४. यहाँ 'रात्रि: पदको भी रात्रिके अभिमानी देवताका ही वाचक समझना चाहिये। इसका स्वरूप अन्धकारमय होता है। दिनके अभिमानी देवताकी भाँति इसका अधिकार भी जहाँतक पृथ्वीलोककी सीमा है, वहाँतक है। भेद इतना ही है कि पृथ्वीलोकमें जिस समय जहाँ दिन रहता है, वहाँ दिनके अभिमानी देवताका अधिकार रहता है और जिस समय जहाँ रात्रि रहती है, वहाँ रात्रि-अभिमानी देवताका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे जानेवाले साधकको पृथ्वीलोककी सीमासे पार करके अन्तरिक्षमें कृष्णपक्षके अभिमानी देवताके अधीन कर देना इसका काम है। यदि वह साधक शुक्लपक्षमें मरता है, तब तो उसे कृष्णपक्षके आनेतक अपने अधिकारमें रखकर और यदि कृष्णपक्षमें मरता है तो तुरंत ही अपने अधिकारसे पार करके कृष्णपक्षाभिमानी देवताके अधीन कर देता है। ५. कृष्णपक्षाभिमानी देवताका वाचक यहाँ “कृष्ण:” पद है। इसका स्वरूप भी अन्धकारमय होता है। पृथ्वी-मण्डलकी सीमाके बाहर अन्तरिक्षलोकमें, जिन पितृलोकोंमें पंद्रह दिनका दिन और उतने ही समयकी रात्रि होती है, वहाँतक इसका भी अधिकार है। भेद इतना ही है कि जिस समय जहाँ उस लोकमें शुक्लपक्ष रहता है, वहाँ शुक्लपक्षाभिमानी देवताका अधिकार रहता है और जहाँ कृष्णपक्ष रहता है, वहाँ कृष्णपक्षाभिमानी देवताका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे स्वर्गमें जानेवाले साधकोंको दक्षिणायनाभिमानी देवताके अधीन कर देना इसका काम है। जो दक्षिणायन-मार्गका अधिकारी साधक उत्तरायणके समय इसके अधिकारमें आता है, उसे दक्षिणायनका समय आनेतक अपने अधिकारमें रखकर और जो दक्षिणायनके समय आता है, उसे तुरंत ही यह अपने अधिकारसे पार करके दक्षिणायनाभिमानी देवताके पास पहुँचा देता है। ६. जिन छ: महीनोंमें सूर्य दक्षिण दिशाकी ओर चलते रहते हैं, उस छमाहीको दक्षिणायन कहते हैं। उसके अभिमानी देवताका वाचक यहाँ “दक्षिणायनम्‌” पद है। इसका स्वरूप भी अन्धकारमय होता है। अन्तरिक्षतोकके ऊपर जिन देवताओंके लोकोंमें छ: महीनोंका दिन और छ: महीनोंकी रात्रि होती है, वहाँतक इसका भी अधिकार है। भेद इतना ही है कि उत्तरायणके छ: महीनोंमें उसके अभिमानी देवताका वहाँ अधिकार रहता है और दक्षिणायनके छ: महीनोंमें इसका अधिकार रहता है। दक्षिणायन-मार्गसे स्वर्गमें जानेवाले साधकोंको अपने अधिकारसे पार करके उपनिषयदोंमें वर्णित पितृलोकाभिमानी देवताके अधिकारमें पहुँचा देना इसका काम है। वहाँसे पितृलोकाभिमानी देवता साधकको आकाशाभिमानी देवताके पास और वह आकाशाभिमानी देवता चन्द्रमाके लोकमें पहुँचा देता है (छान्दोग्य उप० ५ १६)। यहाँ चन्द्रमाका लोक उपलक्षणमात्र है; अत: ब्रह्मेके लोकतक जितने भी पुनरागमनशील लोक हैं, चन्द्रलोकसे उन सभीको समझ लेना चाहिये। ध्यान रहे कि उपनिषदोंमें वर्णित यह पितृलोक वह पितृलोक नहीं है, जो अन्तरिक्षके अन्तर्गत है और जहाँ पंद्रह दिनका दिन और उतने ही समयकी रात्रि होती है। ३. स्वर्गादिके लिये पुण्यकर्म करनेवाला पुरुष भी अपनी ऐहिक भोगोंकी प्रवृत्तिका निरोध करता है, इस दृष्टिसे उसे भी “योगी” कहना उचित है। इसके सिवा योगगश्रष्ट पुरुष भी इस मार्गसे स्वर्गमें जाकर वहाँ कुछ कालतक निवास करके वापस लौटते हैं। वे भी इसी मार्गसे जानेवालोंमें हैं। अत: उनको “योगी” कहना उचित ही है। यहाँ “योगी” शब्दका प्रयोग करके यह बात भी दिखलायी गयी है कि यह मार्ग पापकर्म करनेवाले तामस मनुष्योंके लिये नहीं है, उच्च लोकोंकी प्राप्तिके अधिकारी शास्त्रीय कर्म करनेवाले पुरुषोंके लिये ही है (गीता २४२, ४३, ४४ तथा ९।२०, २१ आदि)। २. चन्द्रमाके लोकमें उसके अभिमानी देवताका स्वरूप शीतल प्रकाशमय है। उसीके-जैसे प्रकाशमय स्वरूपका नाम “ज्योति” है और वैसे ही स्वरूपको प्राप्त हो जाना--चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होना है। वहाँ जानेवाला साधक उस लोकमें शीतल प्रकाशमय दिव्य देवशरीर पाकर अपने पुण्यकर्मोके फलस्वरूप दिव्य भोगोंको भोगता है। 3. चन्द्रमाकी ज्योतिको प्राप्त होकर वहाँ रहनेका नियत समय समाप्त हो जानेपर इस मृत्युलोकमें वापस आ जाना ही वहाँसे लौटना है। जिन कर्मोंके फलस्वरूप स्वर्ग और वहाँके भोग प्राप्त होते हैं, उनका भोग समाप्त हो जानेसे जब वे क्षीण हो जाते हैं, तब प्राणीको बाध्य होकर वहाँसे वापस लौटना पड़ता है। वह चन्द्रलोकसे आकाशमें आता है, वहाँसे वायुरूप हो जाता है, फिर धूमके आकारमें परिणत हो जाता है, धूमसे बादलमें आता है, बादलसे मेघ बनता है, इसके अनन्तर जलके रूपमें पृथ्वीपर बरसता है, वहाँ गेहूँ, जौ, तिल, उड़द आदि बीजोंमें या वनस्पतियों में प्रविष्ट होता है। उनके द्वारा पुरुषके वीर्यमें प्रविष्ट होकर स्त्रीकी योनिमें सींचा जाता है और अपने कर्मानुसार योनिको पाकर जन्म ग्रहण करता है। (छान्दोग्य उप० ५ मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्‌ । हेतुनानेन कौन्तेय जगत्‌ विपरिवर्तते हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाताके सकाशसे प्रकृति चराचरसहित सर्वजगत्‌को रचती हैः और इस हेतुसे ही यह संसार-चक्र घूम रहा है

arjuna uvāca |

Hỡi Arjuna, (đoạn được cung cấp không phải là câu kệ Sanskrit nguyên văn mà là một phần chú giải Hindi dài) nó bàn về hai con đường sau khi chết—devayāna và pitṛyāna—qua các biểu tượng như khói, đêm, nửa tháng tối và thời kỳ mặt trời đi về phương nam. Về mặt đạo đức, đoạn này nhấn mạnh rằng đích đến sau khi chết được định hình bởi kỷ luật tu tập và công đức; và ngay cả thành tựu cõi trời cũng vô thường, khi phước cạn thì lại trở về luân hồi tái sinh.

मयाby me
मया:
Karana
TypePronoun
Rootअस्मद्
Form—, Instrumental, Singular
अध्यक्षेणas overseer / by the superintendent
अध्यक्षेण:
Karana
TypeNoun
Rootअध्यक्ष
FormMasculine, Instrumental, Singular
प्रकृतिःNature
प्रकृतिः:
Karta
TypeNoun
Rootप्रकृति
FormFeminine, Nominative, Singular
सूयतेis produced / brings forth
सूयते:
TypeVerb
Rootसू (प्रसव/जनन)
FormPresent, Indicative, Atmanepada (Passive/Reflexive usage), 3rd, Singular
that
:
TypePronoun
Rootतद्
FormMasculine, Accusative, Singular
चरmoving
चर:
TypeAdjective
Rootचर
FormMasculine, Accusative, Singular
अचरम्non-moving
अचरम्:
TypeAdjective
Rootअचर
FormNeuter, Accusative, Singular
हेतुनाby the cause
हेतुना:
Karana
TypeNoun
Rootहेतु
FormMasculine, Instrumental, Singular
अनेनby this
अनेन:
Karana
TypePronoun
Rootइदम्
FormMasculine, Instrumental, Singular
कौन्तेयO son of Kunti
कौन्तेय:
TypeNoun (Proper/Vocative)
Rootकौन्तेय
FormMasculine, Vocative, Singular
जगत्the world
जगत्:
Karta
TypeNoun
Rootजगत्
FormNeuter, Nominative, Singular
विपरिवर्ततेrevolves / turns about
विपरिवर्तते:
TypeVerb
Rootविपरि-वृत्
FormPresent, Indicative, Atmanepada, 3rd, Singular

अजुन उवाच

A
Arjuna
B
Brahman (as Supreme Lord, per commentary)
D
Dhūma (smoke, as a cosmic marker)
R
Rātri (night, as a cosmic marker)
K
Kṛṣṇa-pakṣa (dark fortnight)
D
Dakṣiṇāyana (southern course of the sun)
P
Pitṛloka
Ā
Ākāśa (space, as a station in the described return sequence)
C
Candra/Candraloka (moon-world)
S
Svarga (heaven, implied)
C
Chāndogya Upaniṣad (citation in commentary)

Educational Q&A

The commentary emphasizes two post-mortem trajectories: one leading to non-return (union with the Supreme, as interpreted here) and another leading to heavenly enjoyment followed by return to rebirth when merit is exhausted—highlighting the ethical weight of disciplined practice and karmic causality.

Although the verse text is not provided, the surrounding explanation situates Arjuna’s inquiry within a teaching on death and destiny: cosmic ‘markers’ (smoke, night, dark fortnight, southern course) denote a return-bound path culminating in lunar/heavenly realms and eventual descent back to human birth.