अध्याय ९ — धृतराष्ट्रस्य युधिष्ठिरं प्रति राजनित्युपदेशः
Dhṛtarāṣṭra’s Counsel on Royal Policy to Yudhiṣṭhira
पित्रा स्वयमनुज्ञातं कृष्णद्वैपायनेन वै । वनवासाय धर्मज्ञा धर्मज्ञेन नूपेण ह,“सज्जनो! मैं बूढ़ा हूँ। मेरे सभी पुत्र मार डाले गये हैं। मैं अपनी इस धर्मपत्नीके साथ बारंबार दीनतापूर्वक विलाप कर रहा हूँ। मेरे पिता स्वयं महर्षि व्यासने मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दे दी है। धर्मज्ञ पुरुषो! धर्मके ज्ञाता राजा युधिष्ठिरने भी वनवासके लिये अनुमति दे दी है। वही मैं अब पुनः बारंबार आपके सामने मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूँ। पुण्यात्मा प्रजाजन! आपलोग गान्धारीसहित मुझे वनमें जानेकी आज्ञा दे दें!
vaiśampāyana uvāca | pitrā svayam anu jñātaṃ kṛṣṇadvaipāyanena vai | vanavāsāya dharmajñā dharmajñena nṛpeṇa ha ||
Vaiśampāyana nói: Được chính phụ thân là Kṛṣṇa Dvaipāyana (Vyāsa) cho phép, và cũng được vị vua am tường dharma cho phép, ông—vốn cũng là người hiểu dharma—đã quyết chí lên đường vào rừng sống đời ẩn cư (vanavāsa).
वैशम्पायन उवाच